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Tuesday, July 3, 2012

प्रभु से कहा-सुनी

ये किस मुकाम पर मुझको ला दिया तूने ?
कुछ बचा ही नहीं, जिसे पाने का मैं प्रयास करूँ |

तूने,
कवि की कविता को अर्थहीन,
महत्वाकांक्षी को महत्वहीन,
और, 'प्रदीप' को अँधेरे का प्रेमी बना दिया ?

ये नदी बनायी है,
तो मुझको थोड़ी प्यास दे |
खुदा कहूँ मैं तुझे,
ऐसी मुझको आस दे |

वर्ना,
तेरी रचना अर्थहीन,
तू महत्वहीन,
और, तेरे मंदिरों में अँधेरा हो जायेगा ||

Year 2007

'
प्रदीप'

2 comments:

  1. sikyate bahut ki hai aapne upparwale ki, aapko kavita karane ki pyas di hai na

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  2. very nice poem...bina pyas ke jeevan soona

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