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Saturday, July 7, 2012

'कुछ घूंघट अपना खोल प्रिये'


बड़े दिनों के बाद, आज
फिर हाथों में है सजी कलम
प्रिये कल्पना,   तुम सोयी थी
या तेरा है पुनर्जनम ?

तुम अपने संग लायी हो
प्रश्न कई भारी भारी
हिम पर्वत की शोभा लिख दूं
या दिल्ली की लाचारी ?

तुम 'तुलसी' की 'मानस' हो
'
जायस' की 'पद्मावत' तुम
'
दिनकर' की तुम 'रश्मिरथी'
'
कबीरा' की कही कहावत तुम |
पर आज ह्रदय में आन बसी
तुम किस चुनरी को ओढ़ प्रिये ?
मैं भाव लिखूं तेरे मन के
कुछ घूंघट अपना खोल प्रिये ||

प्रीतम की मैं विरह लिखूं
या रति का मैं श्रृंगार करूँ ?
संकेत मिले तेरा यदि तो
नन्ही बिटिया का दुलार करूँ |
ये मेरे मन की बातें हैं
कुछ अपने मन की बोल प्रिये
जो तेरे हिय में छलक रहा
स्याही में रस वो घोल प्रिये |
कुछ घूंघट अपना खोल प्रिये ||

घूंघट के पीछे मृगनयनी
या दुर्गा का तू रूप धरे
तन से मादकता टपक रही
या रोम रोम अंगार भरे |
तेरे निश्छल मन का प्रेमी मैं
मत काया काया तोल प्रिये
जो भी है, बहार आने दे
हर रूप तेरा अनमोल प्रिये |
कुछ घूंघट अपना खोल प्रिये ||

आज मिलन हो जाने दे
कृति गर्भित को जन जाने दे
अपनी बिटिया की किलकारी पे
सारी दुनिया मुस्काने दे |
संपूर्ण विश्व का अंधियारा
हरने की जिसमें क्षमता है
वह सूर्य उदय हो जाने दे
है सक्षम तेरी गोद प्रिये ||
कुछ घूंघट अपना खोल प्रिये ||

30/06/2012
'प्रदीप'

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