जो बहुत बोलते हैं, वो दिल खोलते हैं
जो नहीं बोलते हैं, बहुत तोलते हैं ||
कुछ मेरे दुश्मनों का जिक्र करते हैं आधा
वो सदा मेरे मन को यूँ टटोलते हैं ||
मुस्करा कर सदा बात करता है कोई
जो शब्दों अपने शहद घोलते हैं ||
ख़ामोशी भी किस्से सुनाती है तब तब
भाव पीड़ा के जब जब नयन बोलते हैं ||
शब्द मन के ज़हर में भिगोते हैं अक्सर
तीर तान तान तानों के जो छोड़ते हैं ||
अर्थ सागर सा अक्सर समा लेते हैं
ओस की बूँद जैसा जो कम बोलते हैं ||
नर्म मरहम सा खुद वो बन जायेंगे
देख जख्मों को मेरे गरम बोलते हैं ||
मेरी पीड़ा में उनसे तुम भिड़ना नहीं
मित्र हमको ह्रदय से ये जो बोलते हैं ||
धूम्र वाणी में उनके महक जाएगा
जो इर्ष्या में जलते हुए बोलते हैं ||
वो करेले की सब्जी खिलाते हैं आगे
जो लड्डू की थैली लिए घूमते हैं ||
घोल देंगी ये जीवन में संजीवनी
हाँ हम बातें कसैली अभी बोलते हैं ||
02/ 08/ 2102
'प्रदीप'
sundar rachna pradeep ji bs ye karele wali line poem ke flavour se thodi alag lagi :-)
ReplyDeleteBlog par aane ke liye bahut bahut aabhaar Parul ji...karele waali pankti ke baare mein kuchh anya logon ka bhi yahi mat hai
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