मित्रों 'कांटे
की व्यथा' खंडकाव्य
का दूसरा खंड आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ |
'कांटे
की व्यथा'
खंड दो – ‘मातृत्व’
पुरुष बना कर भेजा मुझको, प्रभु ने इस संसार में
प्रसव पीर से उपजा भाव, मातृत्व, कहाँ अधिकार में?
पर नसीब के खेल निराले, रचे यहाँ करतार ने
क्षणिक बोध तो हुआ मुझे भी, मातृ भाव का सार में ||
बीत चुके शैशव वसंत थे, जीवन यात्रा के मेरे
पथ में आई कुसुम वाटिका, पुष्प खिले थे बहुतेरे |
निज धुन मस्त, ध्येय आसक्त, गुजर रहा बस उन्हें निहार
तभी दिखा इक फूल परेशां, नीर नयन में लिए पुकार ||
निर्दयी किसी ने स्वार्थवश, डाली खींची उसकी नीचे
फंसा डाल कंटक झाड़ी में, चला गया वह अपने पीछे |
और पुष्प वह जूझ रहा था, शूल मुक्त होने खातिर
फड़फड़ा रहा था पंखुरी अपनी, इधर उधर वह हो आतुर ||
फूल तो ठहरा फूल बेचारा, विधि ने कोमल अंग दिया
काँटों से भिड़ना जग में, उसके वश की बात कहाँ ?
देख दशा मैं उस निरीह की, अनायास था खिंचा उधर
क्रोध बहुत था उपजा मन में, मेरे काँटों के ऊपर ||
कर संभालकर डाली उसकी, तोड़ गिराया एक एक शूल
अधर लगे मुस्काने उसके, जो हंसी गया था अपनी भूल |
हाथ पकड़कर डाली अपने, एकटक था मैं उसे निहार
विक्षत मन उसका सहलाया, भर आँखों में अपने प्यार ||
सुर्ख बदन में उसके उभरा, मन में सोया हुआ पराग
यह मेरा जीवन महकाए, गयी कामना इधर भी जाग |
थाम के डाली हौले से वह, लगा कल्पना करने मैं
मानस पट पर प्रेम रंग से, लगा अल्पना भरने मैं ||
जो अनजाना अभी मुझे था, देखो जीवन सार हुआ
मन ऐसी गति में सक्षम, क्षण में परिचय अपार हुआ |
शूल मुक्त कर दी डाली, पर छोड़ नहीं पाया उसको
हुई कामना तरू पल्लवित, तोड़ नहीं पाया जिसको ||
पर माथे की एक लकीर, हो कुटिल बहुत ही मुस्काई
जो तोडा था शूल, चुभा पग, कल्पित उड़ान धरा आई |
काँटा निकालने को पैरों से, हाथ तुरत नीचे आये
मैं मदहोश प्रेम, नहिं सोचा, डाल पुष्प नभ लहराए ||
पुष्प बहुत अब दूर था मुझसे, पहुँच नहीं सकता उस तक
नहि तोड़ा रख मर्यादा माली, थी हाथ मेरे डाली जब तक |
देख कुटिल चाल भाग्य की, मैं मन ही मन मुस्काया
मगर रो पड़ा भाग्य विधाता, जब देखी स्वरचित माया ||
व्यंग लिए, मैंने पूछा “प्रभु, था विदित तुम्हे जो होना था
अतः तुम्हे तो हँसना
और, मुझे भाग्य पर रोना था ?"
प्रभु बोले “मैं पापी हूँ, जाने क्या मन में आया ?
इंसान रचा है बाद में मैंने, पहले नसीब हूँ लिख आया ||
पूर्व जन्म के कर्मों का फल, है नसीब तेरा प्यारे
मर्यादित जीवन जिससे हो, यह ढोंग अतः रचे सारे |
वर्ना, ज्ञात न पूर्व कर्म तब, उनके फल का बोध ही क्या ?
इसी जन्म के कर्मों का फल, चखने का है अलग मज़ा ||
कर्म तेरा सुन्दर था, वर मांग एक अतः मुझसे
मुक्त तभी हो पाऊंगा, ग्लानि बोध से मैं खुदके |"
बसा हुआ जो हिय प्रसून था, भुला नहीं उसको पाया
रख ली लाज भाग्य की मैंने, मातृत्व भाव से कह आया ||
"खुशहाल रहे, खुशियों से भरी, पुष्प खुशबू सदा ये लुटाता रहे
जिसकी बगिया में हो, ऐ प्रभु सुन मेरे, वो फूले फले मुस्कुराता रहे
देहि शांत रहे, जिसके शव पर गिरे, मन्त्र ऐसा कोई फूल में फूंक दे
जिसके हाथों भी अर्पण हो ये तुम्हे, वर उसको तुम्हे देना ही पड़े || "
प्रभु बोले “मैं पापी हूँ, जाने क्या मन में आया ?
इंसान रचा है बाद में मैंने, पहले नसीब हूँ लिख आया ||
पूर्व जन्म के कर्मों का फल, है नसीब तेरा प्यारे
मर्यादित जीवन जिससे हो, यह ढोंग अतः रचे सारे |
वर्ना, ज्ञात न पूर्व कर्म तब, उनके फल का बोध ही क्या ?
इसी जन्म के कर्मों का फल, चखने का है अलग मज़ा ||
कर्म तेरा सुन्दर था, वर मांग एक अतः मुझसे
मुक्त तभी हो पाऊंगा, ग्लानि बोध से मैं खुदके |"
बसा हुआ जो हिय प्रसून था, भुला नहीं उसको पाया
रख ली लाज भाग्य की मैंने, मातृत्व भाव से कह आया ||
"खुशहाल रहे, खुशियों से भरी, पुष्प खुशबू सदा ये लुटाता रहे
जिसकी बगिया में हो, ऐ प्रभु सुन मेरे, वो फूले फले मुस्कुराता रहे
देहि शांत रहे, जिसके शव पर गिरे, मन्त्र ऐसा कोई फूल में फूंक दे
जिसके हाथों भी अर्पण हो ये तुम्हे, वर उसको तुम्हे देना ही पड़े || "
05/10/2012
'प्रदीप'