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Sunday, December 30, 2012

"खुदगर्ज मीडिया"

"खुदगर्ज मीडिया"

सिसकी बिटिया निर्बल दिल्ली की
'इंडिया' में चीखें हैं गूंजी
सारे हिन्दुस्तान की अबला
चीख रही पर गूंगी गूंगी ।।

सिसकी तक का मोल लगा है
बनिया आंसू तौल रहा है
जिसकी जितनी सुनी जाएगी
उसकी उतनी बोल रहा है ।
पत्रकार की क्या है गलती
बुद्धिजीव वह सदा रहा है
ह्रदय मरा पर बुद्धि जीव है
कान में फ़िल्टर सो बहरा है ।
दिल्ली में मौसम शांत चाहिए
हलकी बारिश भी भारी है
बाकी हिन्दुस्तान की गलियां
खुद सूखेंगी सीली सीली ।
सारे हिन्दुस्तान में अबला
चीख रही है गूंगी गूंगी ।।

'प्रदीप'
30/12/2012

Saturday, December 29, 2012

"ये कलम तेरी खुदगर्जी है"

'दामिनी' को समर्पित

"ये कलम तेरी खुदगर्जी है"

जब लिखना था श्रृंगार,
यौवना का तन मन व्यवहार
मधुर मनचाही मनुहार
राह तकती प्रिय की नारि
भीगता तन प्रेम बौछार
मूक नयनों का नेह उदगार ,
तब सखी रूप तू धरती थी
मन की बातें सब सुनती थी
फिर मटक मटक कर चलती थी
और चिढ़ा नारि, जग कहती थी ।।

मनुज दानव ने ले अवतार
किया उस नारी पर है वार
घिरी वह बैरी बीच अंधियार
अस्मिता भूमि रही है हार
निकट पाकर नहि कोई साथ
निरीह नैनों से रही पुकार,
जब कठिन घड़ी ये आन पड़ी
ऐ कलम कहाँ क्यूँ शांत खड़ी
मत बोल ये रब की मर्ज़ी है
ये कलम तेरी खुदगर्जी है ।।

बन स्वामिनि उनको तू ललकार
जिन हाथों में है तेरी धार
कि, नीली स्याही में है ठण्ड
बदल दे इसका रंग तू लाल ,
मनुजता सूर्य गया मुंह मोड़
स्वयं तू पैदा कर अंगार
शेषनागों का पूजन छोड़
उठा खुद पूर्ण मही का भार ।
जब  तू खुद ही नहीं स्वतंत्र
जप रही दासि प्रथा का मन्त्र
बोलती ताक स्वामि मुंह ओर
तो कैसे कटे निशा घनघोर ।।

किस आशा का मन तेरे वास है
तू ही जग की निरी आस है
ऐ कलम तेरी भी नारि राशि है
तू गुलाम तो सब विनाश है ।।

'प्रदीप'
29/12/2012

Sunday, November 4, 2012

'कांटे की व्यथा' Part 3


मित्रों , खंड काव्य 'कांटे की व्यथा' का तीसरा खंड आपके समक्ष प्रस्तुत है

खंड तीन  - 'शूल प्रतिवाद'

बढ़ा मैं जीवन पथ पर आगे, पुष्प छोड़, यादें लेकर
फिर यादों का हवन किया, हो व्यस्त, भाव आहुति देकर ।
होतीं यादें चतुर, निपुण हैं, अथक युद्ध किया करतीं
दिनभर उनका दमन करो फिर, सपनों में हैं आ जगतीं ।।

पुष्प, प्रेम में समता देखो, दोनों का इक आचार हुआ
बास वहां पर सदा है बसती, वास जहाँ इक बार हुआ ।
फिर मेरा तो पुष्प प्रेम था, मिल दो हुए अती प्रबल
कुटिल कंटक का कुसमय चुभना, मुझको करता अतः विकल ।।

एक रात को स्वप्नलोक में, मिला मुझे फिर से वह शूल
उठी वेदना मन में ऐसी, जैसे बैरी से चखी हो धूल ।
मुस्काता सा लगा मुझे वह, तब क्रोध और बढ़ा मन का
शब्दों के अस्त्र शस्त्र संग, मैं उसके ऊपर जा धमका ।।

“ रे पापी, नीच शूल सुन, तूने कैसा प्रतिशोध लिया ?
मैंने तुझसे फूल छुड़ाया, तूने चुभकर अवरोध किया ?
सुमन सदा से इस जग में, मनुजों के है हेतु हुआ
कंटक ने भी कहीं कभी क्या, फूलों का है भोग किया ?

सरल ह्रदय को चुभते रहना, तेरी प्रवृत्ति सदा रही
तुझ जैसे मनुजों से भी, आच्छादित दिखती मुझे मही ।
सब मर्यादाएं तोड़ के तुम सब, घेर कुसुम को लेते हो
आह निकलती दुखी ह्रदय, कर पान सुखी हो लेते हो ।।

निर्लज्ज कभी सोचा क्या तूने, पग बाधा के हेतु बना ?
जीवन व्यतीत करता है सारा, अकड़ा अकड़ा तना तना ।
पूर्व जन्म के पापों का, परिणाम तुझे ये रूप मिला
फिर खुद से नहीं तू रखता, कोई शिकवा कभी गिला” ।।

पर वह कंटक भाव शून्य सा, ध्यानमग्न हो खड़ा रहा
मेरे शब्द शरों के सम्मुख, योगी योद्धा सा अड़ा रहा ।
पढ़ी हताशा मन की मेरे, सरल भाव से बोला वह
“सुन ले मेरी व्यथा धीर धर, करना फिर तू खुद निर्णय ।।

उस पथ की शोभा हूँ मैं, वीर जिसे अपनाते हैं
देख कर मेरा रूप नुकीला, कायर दिल हिल जाते हैं ।
वीर मनुज खातिर दिव रजनी, फूलों पर देता पहरा
विजय पुष्प वर्ना ले जाता, कोई भी ऐरा गैरा ।।

सार छुपा कर वृहद् ज्ञान का, लघु तन मैं कर लेता हूँ
जटिल प्रश्न इस भांति बना, तब ग्यानी चुनकर देता हूँ ।
साहस, क्षमता और विवेक का, जग परिचय करवाता मैं
रावण सा जब हूँ अकड़ा, तब राम धरा पर लाता मैं ।।

जब मेरा यह रूप अनोखा, मात नियति है रच पायी
तब जाकर ही वसुंधरा, वीरभोग्या कहलायी ।
ग्लानि मुझे किस बात की हो, गर्व भाग्य पर करता शूल
कफ़न सदा ही बनती मेरा, किसी वीर की चरणधूलि ।।

जिस कारण विधि रचे मुझे, मर्यादित करता सदा वही
फूल बहुत से खिले बगल पर, तना रहा मैं हिला नहीं ।
पर स्वार्थ तुझे यदि दिखा कभी, पथभ्रष्ट तुरत तू हो जाता
झुकता सुविधा की खातिर, कष्ट तनिक नहिं सह पाता ।।

तूने सारी बुद्धि लगायी, केवल अपनी सुविधा में
निर्बल भाई लुप्त हो रहे, माँ प्रकृति खड़ी है दुविधा में ।
बिन तेरे तो बाकी के संग, सुखी बहुत सृष्टी रहती
विधि भी शायद सोच रहे, रच मनुज जाति कर दी गलती” ।।

04/11/2012
'प्रदीप'

Friday, October 5, 2012

'कांटे की व्यथा' Part 2



मित्रों 'कांटे की व्यथा'  खंडकाव्य का दूसरा खंड आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ |

'कांटे की व्यथा'  
खंड दो – ‘मातृत्व

पुरुष बना कर भेजा मुझको, प्रभु ने इस संसार में
प्रसव पीर से उपजा भाव, मातृत्व, कहाँ अधिकार में?
पर नसीब के खेल निराले, रचे यहाँ करतार ने
क्षणिक बोध तो हुआ मुझे भी, मातृ भाव का सार में ||

बीत चुके शैशव वसंत थे, जीवन यात्रा के मेरे
पथ में आई कुसुम वाटिका, पुष्प खिले थे बहुतेरे |
निज धुन मस्त, ध्येय आसक्त, गुजर रहा बस उन्हें निहार
तभी दिखा इक फूल परेशां, नीर नयन में लिए पुकार ||

निर्दयी किसी ने स्वार्थवश, डाली खींची उसकी नीचे
फंसा डाल कंटक झाड़ी में, चला गया वह अपने पीछे |
और पुष्प वह जूझ रहा था, शूल मुक्त होने खातिर
फड़फड़ा रहा था पंखुरी अपनी, इधर उधर वह हो आतुर ||

फूल तो ठहरा फूल बेचारा, विधि ने कोमल अंग दिया
काँटों से भिड़ना जग में, उसके वश की बात कहाँ ?
देख दशा मैं उस निरीह की, अनायास था खिंचा उधर
क्रोध बहुत था उपजा मन में, मेरे काँटों के ऊपर ||

कर संभालकर डाली उसकी, तोड़ गिराया एक एक शूल
अधर लगे मुस्काने उसके, जो हंसी गया था अपनी भूल |
हाथ पकड़कर डाली अपने, एकटक था मैं उसे निहार
विक्षत मन उसका सहलाया, भर आँखों में अपने प्यार ||

सुर्ख बदन में उसके उभरा, मन में सोया हुआ पराग
यह मेरा जीवन महकाए, गयी कामना इधर भी जाग |
थाम के डाली हौले से वह, लगा कल्पना करने मैं
मानस पट पर प्रेम रंग से, लगा अल्पना भरने मैं ||

जो अनजाना अभी मुझे था, देखो जीवन सार हुआ
मन ऐसी गति में सक्षम, क्षण में परिचय अपार हुआ |
शूल मुक्त कर दी डाली, पर छोड़ नहीं पाया उसको
हुई कामना तरू पल्लवित, तोड़ नहीं पाया जिसको ||

पर माथे की एक लकीर, हो कुटिल बहुत ही मुस्काई
जो तोडा था शूल, चुभा पग, कल्पित उड़ान धरा आई |
काँटा निकालने को पैरों से, हाथ तुरत नीचे आये
मैं मदहोश प्रेम, नहिं सोचा, डाल पुष्प नभ लहराए ||

पुष्प बहुत अब दूर था मुझसे, पहुँच नहीं सकता उस तक
नहि तोड़ा रख मर्यादा माली, थी हाथ मेरे डाली जब तक |
देख कुटिल चाल भाग्य की, मैं मन ही मन मुस्काया
मगर रो पड़ा भाग्य विधाता, जब देखी स्वरचित  माया ||

व्यंग लिए, मैंने पूछा प्रभु, था विदित तुम्हे जो होना था
अतः तुम्हे तो हँसना और, मुझे भाग्य पर रोना था ?"
प्रभु बोले मैं पापी हूँ, जाने क्या मन में आया ?
इंसान रचा है बाद में मैंने, पहले नसीब हूँ लिख आया ||

पूर्व जन्म के कर्मों का फल, है नसीब तेरा प्यारे
मर्यादित जीवन जिससे हो, यह ढोंग अतः रचे सारे |
वर्ना, ज्ञात न पूर्व कर्म तब, उनके फल का बोध ही क्या ?
इसी जन्म के कर्मों का फल, चखने का है अलग मज़ा ||

कर्म तेरा सुन्दर था, वर मांग एक अतः मुझसे
मुक्त तभी हो पाऊंगा, ग्लानि बोध से मैं खुदके |"
बसा हुआ जो हिय प्रसून था, भुला नहीं उसको पाया
रख ली लाज भाग्य की मैंने, मातृत्व भाव से कह आया ||

"
खुशहाल रहे, खुशियों से भरी, पुष्प खुशबू सदा ये लुटाता रहे
जिसकी बगिया में हो, ऐ प्रभु सुन मेरे, वो फूले फले मुस्कुराता रहे
देहि शांत रहे, जिसके शव पर गिरे, मन्त्र ऐसा कोई फूल में फूंक दे
जिसके हाथों भी अर्पण हो ये तुम्हे, वर उसको तुम्हे देना ही पड़े || "

05/10/2012
'प्रदीप'

कांटे की व्यथा - Part1



मित्रों, एक खंड काव्य लिखने की सोची है | इसके दो खंड लिखा चूका हूँ दो खण्डों के बाद की बात कब लिख पाऊंगा नहीं जानता | उत्साह बनाये रखने के लिए आपके स्नेह और आशीर्वाद की आव्यश्यकता है | फिलहाल, पहला खंड आज आपके समक्ष है | पढ़कर बताइयेगा कैसा लिख पाया |

'कांटे की व्यथा'
खंड एक --'प्रकृति नमन'

महाप्रभू की प्रिया तुम्ही,  हे जगत मात मैं तेरी शरण
प्रकृति रूप जब धरा है तुमने, हम सबका तब हुआ जनन |
बच्चों की गलती तुम सहती, मूक रही, क्षति लेकर तन
मात प्रकृति तेरे स्वरुप को, सादर मेरा कोटि नमन ||

देखो मेरा स्वार्थ निजी, कुछ पाने की इच्छा लाया
भूख लगी जब ह्रदय उदर, तब बालक माता तक आया |
काव्य कामना लिए हूँ मन, मैं बालक तेरा अज्ञानी
कविकुल पाने को प्रयासरत, मैं भावहीन, क्षीण वाणी ||

पर जन्म से कोई बालक तो, होता नहीं कभी ज्ञाता
जग में जीने के गुण सारे, सिखलाती उसको माता |
अतः मुझे भी सुन तू मैया, काव्य की भाषा सिखला दे
शब्द, भाव सब तुझसे उपजे, पयपान इन्हीं से करवा दे ||

तरु छाया के नीचे बैठा, मान इसे मैं गोद तेरी
यहीं से लिखना शुरू करे, छू तेरे चरण ये कलम मेरी |
तुम सहाय होना तब मैया, बिगड़ जाए कोई भाव अगर
ज्यों हाथ पकड़ लिखवाती माँ, बालक से पहला अक्षर ||

भाव शब्द ऐसे जब आयें, बोध कठिन होगा जिनका
और उपाय नवीन करना हो, अर्थ बताने को उनका |
तब करना नाटक जीवन कुछ, प्रभु संग स्वांग रचा ऐसे
सीख हेतु, कथा समझाती, अभिनय करके माँ जैसे ||

मन तो बालक का है चंचल, पढने लिखने में रुची कहाँ?
और कई हैं खेल जगत में, भटक जायेगा यहाँ वहां |
मुझे बुलाने तरू तले, तब सूर्य से कहना तेज जले
करने घर भीतर बालक, माँ झूठे क्रोधित नयन करे ||

होगी जब कटु अलोचना, काव्य की मेरे, माँ सुनना
बालक हूँ मैं, टूट कहूँगा, नहीं मुझे अब कुछ पढ़ना |
तब ऐसी प्रिय छटा बिखेरना, कवि मन को सहलाती जो
जैसे माता पढने खातिर, बालक को दुलराती हो ||

इस प्रकार अंबे तुम मेरी, देखभाल करती रहना
हर धड़कन ही माँ पहचाने, अधिक मुझे अब क्या कहना |
कहने चला एक संग मेरे, घटी कभी जो लघू कथा
बुनी है इसमें, सुनी जो मैंने, स्वयं शूल की कही व्यथा ||

'प्रदीप'
04/10/2012