आजकल टेलीवीजन पर मैगी नूडल्स का एक विज्ञापन
चला है | जिसमें श्रद्धेय श्री अमिताभ बच्चन जी एक
ग्रामीण परिवेश में कुछ बच्चों को बता रहे है की किस
प्रकार लाखन नामक बच्चे के दौड़ में जीतने पर उसकी माँ ने उपहारस्वरूप उसे पांच
रुपये की 'छोटू मैगी'
खरीद कर खिलाई | यह
विज्ञापन पहली बार देखने पर मेरे मन जो भाव उत्पन्न हुए, वो
आज इस कविता के रूप में आपके समक्ष
प्रस्तुत हैं | इसके द्वारा किसी का अपमान करने की मेरी नीयत
नहीं है | बस मन के भाव हैं |
शहरों में है राज कर चुकी, गावों की बारी आई
अमीताभ जी लेकर आये, छोटू मैगी भाई ||
भूजा चना चबैना खाते, गावों में हैं सारे
सो दुबले पतले रह जाते, बिन मैगी बेचारे |
और गरीब जनता गावों में, भूख क़र्ज़ से मरती
मैगी के सुधा स्वाद से, वंचित अक्सर रहती ||
गरीब वयस्क खुद को रोकेंगे, अतः बिकेगी मैगी कब ?
बच्चों की ललचाई आँखों को, दिखलाया छोटू मैगी तब |
हरिवंशज अमित आभ की, आभा काम में आई
मैगी को छूकर गरीब की, बटुली धन्य कहाई ||
तब मेरा मस्तिष्क यह बोला, उद्योगों ने है चाल चली
नवभारत को डसने देखो, मैगी है सर्पिनी बनी |
ज्यादा आबादी गावों में, पर गरीब हैं वहां सभी
पांच रुपये ही नोंचो सबसे, मैगी छोटू बनी तभी ||
पर बोल उठा मेरा दिल यह, ग्रामीणों सा भोला भाला
"रे दिमाग ! तू स्वार्थजनक, होकर आया क्या मधुशाला ?
अमिताभ जी नहीं रे ऐसे, हर प्रकार संपन्न सुखी
छलेंगे काहें वो गरीब को, जो पहले से स्वतः दुखी ?
देख दशा दयनीय गाँव की, पिछड़ा ना रह जाए
राष्ट्रप्रेम भावों से भर, वो आगे बढ़कर आये |
वो महान, जनता के प्यारे, धोखा नहीं दिया होगा
निश्चित इस विज्ञापन का, कुछ दाम नहीं लिया होगा" ||
गद्य में भी कह सकता था, पर पद्य यहाँ चुना मैंने
स्वार्थहीन कविता रग बहती, उनमें, कहीं सुना मैंने ||
०६ सितम्बर २०१२
'प्रदीप'