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Friday, August 31, 2012

'भ्रष्टाचार - कामदेव'

भ्रष्टाचार असुर से, हे कामदेव !
तुलना में सम हो जाते हो
फिर बतलाओ क्यूँकर तुम
देवों में पाए जाते हो ?
साधू योगी का कोई जब
ईमान हिलाना होता है
तुम दोनों का अक्सर तब
उपयोग में आना होता है ||

कनक सुंदरी का चितवन
रिश्वत में आगे करते हो
ध्यान दिया तुम पर क्षण भर
आगोश में अपने भरते हो |
तुम दोनों ही मुझको तो
बाली जैसे लगते हो
सम्मुख होता, तुम मेरा तब
बल आधा हर लेते हो ||

पर तुमको तो रूद्र ने अपनी
भस्म किया आँखों से था
और बालि को रामचंद्र ने
वध डाला त्रेता में था |
पर शायद तब शिव क्रोधित थे
और राम थे आड़ लिए
क्षीण हुआ प्रभाव वार का
नष्ट नहीं तुम पूर्ण हुए ||

वह अवशेषित अंश तुम्हारा
अन्दर मेरे बैठा है
पुनर्जन्म ले तुम आये
अब साथ तुम्हारा देता है |
इसी प्रकार भ्रष्ट असुर
जब सम्मुख मेरे होता है
मेरे अन्दर बैठा कोई
संग उसके हो लेता है ||

तेरे वश से, जो नहिं मेरा
इच्छा उसकी रखता हूँ
असंतुलित होगा समाज
इस मर्यादा से नहिं डरता हूँ |
तुम दोनों के बंधन से मैं
बाहर जब आ जाता हूँ
आत्मग्लानि के बोध से मैं
हिय भीतर तक भर जाता हूँ ||

उभय शत्रु  से भिड़ने का अब
उपाय नवीन करना होगा
तुझसे, रक्षा कवच मंत्र यह
इसमें प्रवीण बनना होगा |
"
धर संतोषी रूप, पार्वती
देवी आ समा मुझमें,
अन्दर बैठा लोभी कामी
असुर हनन क्षमता तुझमें "

तब नहिं होगा मुझमें कोई
जो तेरा साथ निभाएगा
तेरा संग, मेरी इच्छा से
सृजन हेतु रह जाएगा |
और कभी जब भ्रष्टासुर
आएगा सम्मुख मेरे
होंगे प्रयुक्त तब शिव त्रिनेत्र
या शर मर्यादा पुरषोत्तम के ||

देखो ना, मेरी युक्ति यह
उत्तर कोई समझाती है
असुर देव में अंतर क्या ?
शायद यह भाव बताती है |
तुम सृष्टी का आधार अंग
सृजन तुम्ही से होता है
हानि नहीं, यदि संयम संग हो
लाभ सभी को होता है ||

पर भ्रष्टासुर में गुण ऐसा
कोई नहीं दिखा अब तक
सदा हानि प्रद वह रहता
नष्ट न हो पूरा जब तक |
शायद इससे प्रभु ने तुमको
देवों में रख छोड़ा है
मैं शंकित था अब तक क्यूँकर
विधि ने नीयम तोडा है ||

३१ / ०८ / २०१२
प्रदीप

Tuesday, August 28, 2012

'भ्रष्टाचार : वृक्ष'


मेरे भगवान् श्रेष्ठ इंसान
तुझको इतना क्या पता?
भ्रष्ट नीयत ने तुम्हारी
हाथों में आरी दी थमा
काटता, मुझमें ईमान देख
वृक्ष हूँ, मूक रहता सर्वदा
पर श्रृष्टि का आधार मैं
जी पायेगा मेरे बिन तू बता ?

विधि का मैं सोलर पैनेल
सीखा बढ़ आतप सहना
बिन भेदभाव फल छाया देना
नियति बंध हो रहना |
पर तूने मुझको काट काट कर
आश्रय हीन किये कितने
लुप्तप्राय हो गए सभी वो
पशु, पक्षी, गरीब थे जितने ||

रोकी कभी तरक्की कोपल की
पायी तो काटी जड़ मेरी
और स्वार्थवश तू करता
चापलूस कंक्रीट भ्रष्ट तरी |
ऊंची चारदीवारी में दुर्गम
ऊंचे कंक्रीट हो जाते हैं
मैं फल से यदि लदा कभी
भुज जनता को झुक जाते हैं ||
 
पर कालचक्र के पहलू कुछ
जो तेरे वश में कभी नहीं
उद्विग्न कभी रवि हो जाता
विचलित हिल जाती कभी मही |
ऐसे में तेरे कंक्रीट
आरोप नहीं खुद ले लेंगे
झुलसायेंगे ये तुझको भी
दाबेंगे अपने मलबे में ||

तेरी संताने तेरे ही
कर्मों का प्रतिफल पाएंगी
मेरे बिन इस कंक्रीट में
जब साँसे दूभर हो जायेंगी |
तब मेरी उत्पत्ति का
तुम अभियान चलाओगे
ईमान जगाओ, वृक्ष लगाओ
अनशन पर अड़ जाओगे ||

28 /08 / 2012
'
प्रदीप'