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Monday, July 2, 2012

श्यामल चुनरी ओढ़ प्रिये


प्रस्तुत कविता एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है जो संसार के हृदयाघात और विश्वासघात से त्रस्त होकर   एकांतवासी हो गया है | प्रेम की संभावनाएं सो गयी हैं लेकिन तभी एक दस्तक होती है और फिर सन्नाटा | व्यक्ति को एक जंगल से चित्रित किया है और उसके ह्रदय को जंगल के बीच तालाब से |

ठहर चूका था प्रेम नीर
इस ह्रदय सरोवर में कबका
क्यूँ तभी अचानक प्रेम तुम्हारा
बन मोती इसमें टपका ?

क्या मिला तुम्हे कर मुझे तरंगित ?
सुख कौन तुम्हे मिल जायेगा ?
मैं मरी नींद से जाग उठा
अब कष्ट मुझे बढ़ जायेगा |

दे वास्ता मुझे निलय का
कानन देह कटी मेरी,
केवल सूखी नहीं, अस्थियाँ
बिकीं लहू सनी भी मेरी |

अब भी जब कोई राही
प्यासा गर हो जाता है,
दो-चार अंजुली ही लेकिन
यह लहू मेरा घट जाता है |

उन हाथों की हलचल से
मैं करवट तो ले लेता हूँ,
पर बस में नहीं रोक ले सारंग
मैं सोच यही सो लेता हूँ |

पर आज ह्रदय में वार किया है
बीचो-बीच अरे तुमने,
मैं जाग उठा, मैं काँप उठा
यह रंग कौन भरा तुमने ?

क्यूँ एक बूँद टपकाती हो ?
क्यूँ झूठी आस जगाती हो?
मैं श्रांत जीव सो रहा पड़ा
क्यूँ कच्ची नींद उठाती हो ?

मेघा ! श्वेत रूप छोड़ दे
श्यामल चुनरी ओढ़ प्रिये,
बन घनघोर घटा, तू बरस यहाँ
भर जग ने जो हैं घाव किये |

मैं देह धरूँ, मैं झूम उठूँ
कोई तो लगे मुझे मेरा,
मन पुलकित तेरा भी होगा
जो सार्थक होगा प्रेम तेरा |

वर्ना, ओ नटखट ! सोने दे,
न खेल यहाँ पर लुकाछुपी,
मैं बहुत दुखी पहले ही हूँ
न हाय तू ले, कर मुझे दुखी ||
1997-98

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