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Monday, July 9, 2012

अभिलाषा


प्रस्तुत कविता मैंने मार्च- अप्रैल १९९८ में अपने बीटेक प्रथम वर्ष के दौरान लिखी | फ़ाइनल इअर वालों के विदाई समारोह (farewell) के लिए मुझे कविता लिखने का कार्य मिला था| लेकिन कुछ उल्टा हो गया और कविता मेरे खुद के विदाई समारोह की बन पड़ी | जबरदस्ती में कोई काम नहीं करना चाहिए | खैर, आप लोगों के समक्ष प्रस्तुत है मेरी नादानी |


मेरी याद तुमको कभी जो सताए
मेरा प्यार तुमको कहीं जो रुलाये
कृपा कर न तुम आसुवों को बहाना
मेरी याद में एक दीपक जलाना |
कि, इससे दिलों का अँधेरा मिटेगा
भावना की नजर को उजेरा मिलेगा
हो भावुक जो तुम निहारोगे उसको
तुम्हे दीप में ये 'प्रदीप' दिखेगा |
तुम्हे दीप में ये 'प्रदीप' दिखेगा ||

जले जो सारे जग के लिए
जियें हम भी आज से सबके लिए
ऐ प्रभु तू मेरी ये रज़ा सुन ले
कहीं भी कोई घर अँधेरा दिखे
इन्हें बस उसी क्षण मेरी याद आये
दीपक एक वहां जल जाए
जले जो सारे जग के लिए
हमारे प्रयासों से जग जगमगाए |
हमारे प्रयासों से जग जगमगाए ||
 
१९९८
'
प्रदीप'

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