"कांटे की व्यथा"
खंड 5 : शूल के रूप
सुन कंटक के तर्क अनोखे, विस्मय सा कुछ मुझे हुआ
शक्ति विवेचन के प्रति उसके, मान भाव हिय मेरे जगा ।
सोचा उसका प्रतिउत्तर दूं, खुद उसकी ही शैली में
अहंकार और क्रोधजनित, बातें तो मेरी मैली हैं ॥
तब विचार को उसके अपने, मन गहरे स्थान दिया
द्रवित हो गए शब्द कड़े जब, ऊष्म भाव सम्मान दिया ।
शब्द गुहा तिष्ठित अब सारे, भाव थे सम्मुख ह्रदय नयन
दैविक आभा युक्त तपस्वी, लगे मुझे सो किया नमन ॥
हिय आया उसके तर्कों से, बुन डालूँ कोई कठिन मैं जाल
और फंसा दूं शूल को उसमें, चलकर कोई शकुनि सी चाल ।
मैं बोला तब "सुनो शूल जी, ज्ञानी से तुम मुझे लगे
करो निवारण कुछ प्रश्नों का, पूछ रहा जो मैं तुमसे ॥ "
"पराधीनता किसे है प्रिय? परवश कौन सुखी जग में?
फड़ फड़ पंछी पंख लड़ाता, बंध जाता जब पिंजर में ।
बलहीन सदा से ही जग में, आधीन शक्ति के हैं रहते
शस्त्र दमकते देव भुज जब, तब झुक मनुज नमन करते ॥ "
"तरु, पशु नर आधीन हुए, सोच स्वांग यह है किसका ?
तुझको प्रभु ने हीन किया, अतः दोष यह है उसका ।
कहो कहाँ से इसमें मेरे, बात स्वार्थ की है आयी ?
आधार बनाकर जिसको तुमने, व्यथा अभी तक है गाई ॥ "
तब मुस्काया शूल कुछ ऐसे, जैसे चाल मेरी समझा
वह बोला "तूने प्रश्नों का, चक्रव्यूह है खूब रचा ।
पर सबसे पहले इसका मैं, तोडूंगा जो अंतिम द्वार
खुल जायेंगे गाँठ सभी, खींचूंगा ऐसा इक तार ॥ "
"प्रश्नों के आवरण के पीछे, छुपा रहा कुछ भेद है तू
अति व्यापक है स्वार्थ तेरा, सुन जिस पर मैं खेद करूँ ।
तरु, पशु से ही नहीं, है तूने, मनुजों में भी भेद किया
किसी कर्म को हल्का कहकर, मान किसी को खूब दिया ॥"
"कहकर चरण को नीच जाति, मुख ऊंचे कुल है जा ऐंठा
धरती सी नारी नीचे कह, ऊपर पुरुष गगन बैठा ।
सोच मनुज की है अक्सर, भाषा से पढ़ी जाती
व्योम, गगन, आकाश पुल्लिंग हैं, धरती नारि कही जाती ॥ "
"जबकि इस अनंत ब्रह्माण्ड में, क्या ऊंचे क्या नीचे है ?
कोण दृष्टि का यदि बदलो तो, जो था आगे वो पीछे है ॥"
"सहता बोझ देह समाज का, देखो जो है नीच चरण
लेकिन क्यूँ श्रृंगारित करता, केवल तू अपना आनन ?
अभिन्न अंग हैं चरण देह के, पर इनका सम्मान है क्या?
पहचान है जब नर की होती, तब देखा जाता बस मुखड़ा ॥ "
"और नारि को ममता देकर, शक्तिमान पुरुष कहलाया
पालन, पोषण मिला मही को, सूर्य, चन्द्र गगन ने पाया ।
उसपर चाह मही की पूरी, करता क्या ऐन्ठोर गगन
मिलन को बरसे कुसमय यदि, बदरा उमड़े खुद के मन ॥"
"नारि में ममता, नमीं धरा में, जीवन का आधार हैं ये
मजबूत नींव हो, सरस जीव हो, सो तन गीला करती वे ।
पर गीले को कीचड़ कहता, खुद खिलता है धुला धुला
भूल गया जो बरसे कारे, सारे थे तेरे बदरा ? "
"मान मही का मान, कालिमा बोझ तेरा ले रहती है
गरज वारि से वार तू करता, झूम झूम वह सहती है ।
कर्म नारि के जो जिम्मे है, उनको तू सम्मानित कर
ठान लिया वर्ना उसने, रहेगी अब बस नर बनकर ॥"
"सूख के अकड़ेगी इतना की, मही गगन हो जाएगी
काट लाज के पेड़ देखना, अर्ध नगन हो जायेगी |
तब फिर हरे भरे आँचल में, क्या कोई शिशु सो पायेगा
पुरुष वसन-कर्मों की होड़ में, माँ का आँचल खो जाएगा ॥"
"मातृत्व नमीं, कोमलता तन की, स्त्रीत्व बोध करवाती हैं
तन फटने की पीर सहन कर, नव अंकुर दे पाती हैं ।
लेकिन कीचड़ कीचड़ सुन, अपमान ताप जब चढ़ जाए
है व्यथा मही के आँचल से, हर बूँद नमीं न उड़ जाए ॥"
"कीचड़, कंकड़, धूल में रहकर, मुख को दे जो शुभ्र पवन
समय कहे, सुन व्यथा मेरी, सम्मानित कर, दे नेह, चरण ।
मुख समान बनने को वर्ना, व्यग्र चरण हो जायेंगे
देह हवा में टिक न सकेगी, धूल में सब मिल जायेंगे ॥"
"छोटा, अकड़ा और नुकीला, कहता मुझको रहा कुरूप
मैं केवल एक शूल नहीं, अनंत मेरे, कुछ सुन ये, रूप ।“
“मैं वह अवाम हूँ आम, जिसे ख़ास पशू सा गिनते हैं
जिनके विरोध के स्वर, उनको कंटक जैसे चुभते हैं |
मैं वह दलित मनुज, कर्म जिसके तू कहता नीच
शूल सी तुझको लगे चुभन, बैठ जब जाता तेरे बीच ।
मैं वह नारी रूप, भोग का तेरे रहा जो अंश
मांगे जो वह मान, शूल से तुझको लगते दंश ॥"
प्रदीप
23/07/2013