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Sunday, March 16, 2014

"विडम्बनाएं"

किरणों को अभिशाप पड़ेंगी वे जिन जिन पर
कर देंगी परछाईं काली किसी पटल पर ।
हर जीवन के संग जनमती मृत्यु, अजय है
हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥
धन औ ऋण का योग बनाता सदा शून्य है
गोल शून्य सा भाल किन्तु रत धन औ ऋण में ।
हासिल जिसका शून्य पराजय वह कहलाती
किन्तु शून्य को छू पाऊँ तो अजय विजय है ॥
हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥
जन्मदिवस कि ख़ुशी प्रसव के पीर से उपजी
राम नाम का ज्ञान मरा में छुपा मिला था ।
शब्द तो कहते हैं, पर क्या यह बात सही है ?
हर बार निराशा के आखिर में आशा तय है ?
हर आशा में छुपा निराशा का भी भय है ॥
प्रदीप
17 /03 /2014

Friday, February 14, 2014

“अनमना अनमना”


अनमना अनमना मन के गीतों का अंत 
मेरे मन से नहीं चल रहा है वसंत |

जब हो खुरदुरी माथ पर की लिखन
राह पथरीली और पग में होती दुखन |
कैसे कर ले तुझे लेखनी तब पसंद ?
शब्द सुन्दर सदा जबकि है तू वसंत ||
अनमना अनमना ......

चाहे अपनों में कितने रहे बेटियाँ 
सिर्फ माँ से ही मन की कहें बेटियाँ |
लिख चुका गीत कितने स्वयं मेरा मन
ढूँढता है मगर आज मानस के छंद ||
अनमना अनमना ......

पंक्तियाँ गीत की अंगुलियां खुद बनें 
खुरदुरे माथों पर धीरे धीरे फिरें |
गीत गीता बनें खत्म कर दें ये द्वंद्व 
किसके मन से चला कब कहाँ है वसंत ||
अनमना अनमना ......

‘प्रदीप’, १२ फरवरी २०१४ 

१ मानस = रामचरितमानस

Thursday, September 26, 2013

'सास बहू के झगड़े'

माँ ममता की लाली घर आँगन छा जाए
जब प्राची की गोद बाल दिनकर आ जाए ।
कलरव कर कर पंछी अपना सखा बुलाएं
चलो दिवाकर खुले गगन क्रीड़ा हो जाए ॥

सब जग में सुन्दरतम तस्वीर यही मन भाती
गोद हों शिशु अठखेलियाँ मैया हो दुलराती |
लगे ईश सी चमक मुझे उन नयनों से आती
तभी यक़ीनन नित प्रातः प्राची पूजी जाती ||

शीत काल है जब जब कठिन परीक्षा आई
खेल हुआ है कम तब तब रवि करे पढाई ।
और, स्वतंत्र हो खूब सूर्य तब चमक दिखाए
विद्यालय हो बंद, ग्रीष्म जब छुट्टी आये ॥

छोड़ो यह खिलवाड़, है आता यौवन जब रे
पश्चिम की प्रमदा सूर्य पर डारे डोरे ।
चुम्बन से अंग अंग उसका जब भानु सजाए 
लाज लालिमा चुनर ओढ़ पश्चिम शर्माए ॥

प्रणय मिलन में तन जब दोनों का है अकड़े
निज बाहों में खींच प्रभाकर पश्चिम जकड़े ।
अपने कारे केश फेर अंबर पर देती  
करती जग अंधियार डुबो खुद में रवि लेती || 

जब यौवन का ज्वार उतर शीतल हो जाता
रवि को आती याद है उसकी प्राची माता ।
कहता "सुन हे प्रिये, मात के पास रहेंगे
पूर्ण जगत की भांति नमन नित उन्हें करेंगे” ॥

लेकिन, पश्चिम चिढ़ी सासु संग नहीं रहूंगी
सब प्राची को मान, वेदना नहीं सहूँगी ।
पूर्व पड़ोसन दक्षिण उससे सदा जली है
मिले न प्राची पश्चिम, द्वय के बीच खड़ी है ॥

इस पर देखो बही है शीतल सी पुरवाई
बहू को अनुभव कथा, पूर्वा ने कहलाई ।
“तुम पश्चिम हो मुझे तुम्हे कोई पूर्व कहेगा
अचर नहीं कुछ जगत, चक्र में सब बदलेगा” ॥

यौवन का पर जोश वधू में भरा हुआ है
बोली भानुप्रिया, बही तब गर्म हवा है ।
“छोड़ो तुम आध्यात्म, पश्चिमी स्वार्थ सुनो
जब झुकनी है कमर, मान में कुछ तो झुको” ॥

निशिदिन यह आदित्य, चक्र नियमित दुहराता
घर घर में चल रही पुरातन है यह गाथा ।
मिलन को न तैयार हैं प्राची पश्चिम अकड़े
फिर कैसे तब बंद हों सास बहू के झगड़े ॥

 
‘प्रदीप’
२४ सितम्बर २०१३

Monday, July 29, 2013

"कांटे की व्यथा" -----खंड 5 : शूल के रूप

"कांटे की व्यथा"

खंड 5 : शूल के रूप 

सुन कंटक के तर्क अनोखे, विस्मय सा कुछ मुझे हुआ 
शक्ति विवेचन के प्रति उसके, मान भाव हिय मेरे जगा । 
सोचा उसका प्रतिउत्तर दूं, खुद उसकी ही शैली में 
अहंकार और क्रोधजनित, बातें तो मेरी मैली हैं ॥ 

तब विचार को उसके अपने, मन गहरे स्थान दिया 
द्रवित हो गए शब्द कड़े जब, ऊष्म भाव सम्मान दिया । 
शब्द गुहा तिष्ठित अब सारे, भाव थे सम्मुख ह्रदय नयन 
दैविक आभा युक्त तपस्वी, लगे मुझे सो किया नमन ॥ 

हिय आया उसके तर्कों से, बुन डालूँ कोई कठिन मैं जाल 
और फंसा दूं शूल को उसमें, चलकर कोई शकुनि सी चाल । 
मैं बोला तब "सुनो शूल जी, ज्ञानी से तुम मुझे लगे 
करो निवारण कुछ प्रश्नों का, पूछ रहा जो मैं तुमसे ॥ "

"पराधीनता किसे है प्रिय? परवश कौन सुखी जग में?
फड़ फड़  पंछी पंख लड़ाता, बंध जाता जब पिंजर में । 
बलहीन सदा से ही जग में, आधीन शक्ति के हैं रहते 
शस्त्र दमकते देव भुज जब, तब झुक मनुज नमन करते ॥ "

"तरु, पशु नर आधीन हुए, सोच स्वांग यह है किसका ?
तुझको प्रभु ने हीन किया, अतः दोष यह है उसका । 
कहो कहाँ से इसमें मेरे, बात स्वार्थ की है आयी ?
आधार बनाकर जिसको तुमने, व्यथा अभी तक है गाई ॥ "

तब मुस्काया शूल कुछ ऐसे, जैसे चाल मेरी समझा 
वह बोला "तूने प्रश्नों का, चक्रव्यूह है खूब रचा । 
पर सबसे पहले इसका मैं, तोडूंगा जो अंतिम द्वार 
खुल जायेंगे गाँठ सभी, खींचूंगा ऐसा इक तार ॥ "

"प्रश्नों के आवरण के पीछे, छुपा रहा कुछ भेद है तू 
अति व्यापक है स्वार्थ तेरा, सुन जिस पर मैं खेद करूँ । 
तरु, पशु से ही नहीं, है तूने, मनुजों में भी भेद किया 
किसी कर्म को हल्का कहकर, मान किसी को खूब दिया ॥"

"कहकर चरण को नीच जाति, मुख ऊंचे कुल है जा ऐंठा 
धरती सी नारी नीचे कह, ऊपर पुरुष गगन बैठा । 
सोच मनुज की है अक्सर, भाषा से पढ़ी जाती 
व्योम, गगन, आकाश पुल्लिंग हैं, धरती नारि कही जाती ॥ "

"जबकि इस अनंत ब्रह्माण्ड में, क्या ऊंचे क्या नीचे है ?
कोण दृष्टि का यदि बदलो तो, जो था आगे वो पीछे है ॥" 

"सहता बोझ देह समाज का, देखो जो है नीच चरण 
लेकिन क्यूँ श्रृंगारित करता, केवल तू अपना आनन ?
अभिन्न अंग हैं चरण देह के, पर इनका सम्मान है क्या?
पहचान है जब नर की होती, तब देखा जाता बस मुखड़ा ॥ "

"और नारि को ममता देकर, शक्तिमान पुरुष कहलाया 
पालन, पोषण मिला मही को, सूर्य, चन्द्र गगन ने पाया । 
उसपर चाह मही की पूरी, करता क्या ऐन्ठोर गगन 
मिलन को बरसे कुसमय यदि, बदरा उमड़े खुद के मन ॥"

"नारि में ममता, नमीं धरा में, जीवन का आधार हैं ये 
मजबूत नींव हो, सरस जीव हो, सो तन गीला करती वे । 
पर गीले को कीचड़ कहता, खुद खिलता है धुला धुला 
भूल गया जो बरसे कारे, सारे थे तेरे बदरा ? "

"मान मही का मान, कालिमा बोझ तेरा ले रहती है 
गरज वारि से वार तू करता, झूम झूम वह सहती है । 
कर्म नारि के जो जिम्मे है, उनको तू सम्मानित कर 
ठान लिया वर्ना उसने, रहेगी अब बस नर बनकर ॥"

"सूख के अकड़ेगी इतना की, मही गगन हो जाएगी
काट लाज के पेड़ देखना, अर्ध नगन हो जायेगी |  
तब फिर हरे भरे आँचल में, क्या कोई शिशु सो पायेगा 
पुरुष वसन-कर्मों की होड़ में, माँ का आँचल खो जाएगा ॥"

"मातृत्व नमीं, कोमलता तन की, स्त्रीत्व बोध करवाती हैं 
तन फटने की पीर सहन कर, नव अंकुर दे पाती हैं । 
लेकिन कीचड़ कीचड़ सुन, अपमान ताप जब चढ़ जाए 
है व्यथा मही के आँचल से, हर बूँद नमीं न उड़ जाए ॥"

"कीचड़, कंकड़, धूल में रहकर, मुख को दे जो शुभ्र पवन 
समय कहे, सुन व्यथा मेरी, सम्मानित कर, दे नेह, चरण । 
मुख समान बनने को वर्ना, व्यग्र चरण हो जायेंगे 
देह हवा में टिक न सकेगी, धूल में सब मिल जायेंगे ॥"

"छोटा, अकड़ा और नुकीला, कहता मुझको रहा कुरूप 
मैं केवल एक शूल नहीं, अनंत मेरे, कुछ सुन ये, रूप ।“ 

“मैं वह अवाम हूँ आम, जिसे ख़ास पशू सा गिनते हैं 
जिनके विरोध के स्वर, उनको कंटक जैसे चुभते हैं |
मैं वह दलित मनुज, कर्म जिसके तू कहता नीच 
शूल सी तुझको लगे चुभन, बैठ जब जाता तेरे बीच । 
मैं वह नारी रूप, भोग का तेरे रहा जो अंश 
मांगे जो वह मान, शूल से तुझको लगते दंश ॥"

प्रदीप
23/07/2013