ऐ मूरख शूल बन गया तू कब से इतना ज्ञानी ?
बोला मैं सुन प्रवचन, जब चढ़ आया सर तक पानी।
"हक़ से ज्यादा बोल रहा क्या इसका है भान तुझे?
विधि के रचना नियमों का, मिला कहाँ से ज्ञान तुझे?
यदि बिन मेरे सृष्टी के संग, तुम सब सुखी बहुत रहते
प्रभु समक्ष फिर बात यही, किस बाधावश नहि कहते?
बहुत ज्ञान था तुझमें फिर, सृष्टि समय क्यूँ मौन रहा
नर रचना का, तरु पशु संग फिर, कहो प्रयोजन कौन रहा?
मैं कहता हूँ नर ही विधि का है लल्ला सबसे प्यारा
मात प्रकृति का ज्येष्ठ पुत्र मैं, उसकी आँखों का तारा।
और दुलारे बेटे को ज्यों खेल खिलौने मिलते हैं
यही सोच कर तुम सब को प्रभु, मेरे हेतु फिर रचते हैं ।।
निहित सृष्टि में जो, मैं उन अनन्य शक्तियों का स्वामी
पराकाष्ठा नहीं है कोई, बुद्धि मेरी बहु आयामी ।
बंधे नियति के नियत चक्र में, इक आयाम तुम लिए हुए
जितनी शक्ति है जिसमें प्यारे, अधिकार हैं उतने मिले हुए।।"
पर उसके चेहरे पर तो न भाव कोई उत्पन्न हुआ
आह, मेरे तर्कों का प्रयोजन, तनिक नहीं संपन्न हुआ।
डोर पकड़ मेरे शब्दों की मन उदधि वो गहरे उतर गया
एकाग्रचित्त गोताखोरी कर, भाव सीप सब बीन रहा ।।
और समाधिस्थ शूल अटल वह, लगा गहन चिंतन करने
विधि नियमावलि सिन्धु लगा ज्यों, ले मेरा तर्काचल मथने।
साम्य भाव से बोल उठा कुछ इस प्रकार की वह वाणी
मनुज जन्म का सार तत्व ज्यों कहता कोई विधि ग्यानी ।।
"पशु पक्षी को तरु संग लेकर, धरती जब प्रभु ने रच दी
तब सृष्टि को राष्ट्र मान इक संविधान पुस्तक लिख दी ।
वृत्ति और अधिकार जगत में, पशु गण के सब सीमित कर
संचालन करने को जग का तब प्रभु रचते अधिकारी नर ।।
काम, क्रोध और भूख जगत में, पशुप्रवृत्ति कहलाती हैं
जो गण पशु हैं, उन पर हरदम ये हावी हो जाती हैं ।
पर संयम उपवास अहिंसा, मिली मनुज को शक्ति यहाँ
खाद्य देखकर खुद को रोके, भूखा पशु देखा है कहाँ ?
जब भी नर किसी रूप में, आधीन भूख के हो जाता
उसमें पशु में, जो भी है, वो अंतर सब खो जाता ।
पर शक्तिमान करने के संग, अभिशप्त मनुज को विधि करता
बुद्धि में रोपा स्वार्थ बीज, जब बढे, बढे तब नर लघुता ।।
नर और पशु की भूख में इससे, एक अनोखा अंतर है
सीमित तालाब है भूख पशु की, नर क्षुधा असीम समुन्दर है ।
देख पराया अंश स्वार्थवश, भूख है ऐसी जग जाती
खा जाती है पूर्ण मनुजता, तृप्त नहीं पर हो पाती ।।
रह जाती केवल तब नर में, पशु प्रवृत्तियां हैं सारी
अविवेकी हिंसक कामी नर बनता तब अत्याचारी ।
अधिकारी का कर्त्तव्य, विधी के मूल भाव को वह समझे
संचालन का भार पूज्य, हों विवेक युक्त कंधे उसके ।
स्वार्थ का चुम्बक खींचेगा, सो संयम की एक तुला बने
भेदभाव के बिना उसी पर तेरा मेरा भाव तुले ।।
भवन राष्ट्र का ढह जाता अधिकारी जब जब भ्रष्ट हुआ
उसके कर्मों का प्रतिफल आश्रय अवाम का नष्ट हुआ ।
संविधान के नीयम सारे पक्ष में अपने मोड़ लिया
भूख थी खुद की सुविधा की सो निहित संतुलन तोड़ दिया।।
तेरे अनुचर खेल खिलौने, थे पशु आदि सभी बनते
नष्ट किया पर उन्हें स्वार्थवश, सुन नीयम विधि के क्या कहते ।
पात्र दंड के उद्दंडी शिशु खेल खिलौने जो तोड़े
खेले उन संग लल्ला प्यारा, नेह धाग टूटन जोड़े ।।
सही कहा है तुमने नर है अनन्य शक्तियों का स्वामी
पर स्वामि शब्द है अर्थहीन बिन अनुचर अथवा अनुगामी ।
यदि स्वामि शब्द का उच्चारण, कर्त्तव्य बोध से तू करता
तेरा अनुगामी बनकर कोई शूल व्यथित फिर क्यूं रहता ।।
प्रदीप
28/02/2013