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Monday, July 29, 2013

"कांटे की व्यथा" -----खंड 5 : शूल के रूप

"कांटे की व्यथा"

खंड 5 : शूल के रूप 

सुन कंटक के तर्क अनोखेविस्मय सा कुछ मुझे हुआ 
शक्ति विवेचन के प्रति उसके, मान भाव हिय मेरे जगा  
सोचा उसका प्रतिउत्तर दूंखुद उसकी ही शैली में 
अहंकार और क्रोधजनित, बातें तो मेरी मैली हैं  

तब विचार को उसके अपने, मन गहरे स्थान दिया 
द्रवित हो गए शब्द कड़े जब, ऊष्म भाव सम्मान दिया  
शब्द गुहा तिष्ठित अब सारे, भाव थे सम्मुख ह्रदय नयन 
दैविक आभा युक्त तपस्वी, लगे मुझे सो किया नमन  

हिय आया उसके तर्कों से, बुन डालूँ कोई कठिन मैं जाल 
और फंसा दूं शूल को उसमें, चलकर कोई शकुनि सी चाल  
मैं बोला तब "सुनो शूल जीज्ञानी से तुम मुझे लगे 
करो निवारण कुछ प्रश्नों का, पूछ रहा जो मैं तुमसे  "

"पराधीनता किसे है प्रियपरवश कौन सुखी जग में?
फड़ फड़  पंछी पंख लड़ाता, बंध जाता जब पिंजर में  
बलहीन सदा से ही जग में, आधीन शक्ति के हैं रहते 
शस्त्र दमकते देव भुज जबतब झुक मनुज नमन करते  "

"तरुपशु नर आधीन हुए, सोच स्वांग यह है किसका ?
तुझको प्रभु ने हीन कियाअतः दोष यह है उसका  
कहो कहाँ से इसमें मेरे, बात स्वार्थ की है आयी ?
आधार बनाकर जिसको तुमने, व्यथा अभी तक है गाई  "

तब मुस्काया शूल कुछ ऐसेजैसे चाल मेरी समझा 
वह बोला "तूने प्रश्नों का, चक्रव्यूह है खूब रचा  
पर सबसे पहले इसका मैंतोडूंगा जो अंतिम द्वार 
खुल जायेंगे गाँठ सभीखींचूंगा ऐसा इक तार  "

"प्रश्नों के आवरण के पीछे, छुपा रहा कुछ भेद है तू 
अति व्यापक है स्वार्थ तेरा, सुन जिस पर मैं खेद करूँ  
तरुपशु से ही नहींहै तूने, मनुजों में भी भेद किया 
किसी कर्म को हल्का कहकरमान किसी को खूब दिया "

"कहकर चरण को नीच जाति, मुख ऊंचे कुल है जा ऐंठा 
धरती सी नारी नीचे कहऊपर पुरुष गगन बैठा  
सोच मनुज की है अक्सर, भाषा से पढ़ी जाती 
व्योम, गगनआकाश पुल्लिंग हैंधरती नारि कही जाती  "

"जबकि इस अनंत ब्रह्माण्ड मेंक्या ऊंचे क्या नीचे है ?
कोण दृष्टि का यदि बदलो तोजो था आगे वो पीछे है ॥" 

"सहता बोझ देह समाज कादेखो जो है नीच चरण 
लेकिन क्यूँ श्रृंगारित करता, केवल तू अपना आनन ?
अभिन्न अंग हैं चरण देह केपर इनका सम्मान है क्या?
पहचान है जब नर की होती, तब देखा जाता बस मुखड़ा  "

"और नारि को ममता देकरशक्तिमान पुरुष कहलाया 
पालनपोषण मिला मही कोसूर्यचन्द्र गगन ने पाया  
उसपर चाह मही की पूरीकरता क्या ऐन्ठोर गगन 
मिलन को बरसे कुसमय यदिबदरा उमड़े खुद के मन "

"नारि में ममतानमीं धरा मेंजीवन का आधार हैं ये 
मजबूत नींव होसरस जीव होसो तन गीला करती वे  
पर गीले को कीचड़ कहताखुद खिलता है धुला धुला 
भूल गया जो बरसे कारे, सारे थे तेरे बदरा ? "

"मान मही का मानकालिमा बोझ तेरा ले रहती है 
गरज वारि से वार तू करताझूम झूम वह सहती है  
कर्म नारि के जो जिम्मे हैउनको तू सम्मानित कर 
ठान लिया वर्ना उसनेरहेगी अब बस नर बनकर "

"सूख के अकड़ेगी इतना की, मही गगन हो जाएगी
काट लाज के पेड़ देखना, अर्ध नगन हो जायेगी |  
तब फिर हरे भरे आँचल में, क्या कोई शिशु सो पायेगा 
पुरुष वसन-कर्मों की होड़ में, माँ का आँचल खो जाएगा "

"मातृत्व नमींकोमलता तन कीस्त्रीत्व बोध करवाती हैं 
तन फटने की पीर सहन कर, नव अंकुर दे पाती हैं  
लेकिन कीचड़ कीचड़ सुन, अपमान ताप जब चढ़ जाए 
है व्यथा मही के आँचल से, हर बूँद नमीं  उड़ जाए "

"कीचड़कंकड़धूल में रहकरमुख को दे जो शुभ्र पवन 
समय कहेसुन व्यथा मेरीसम्मानित करदे नेहचरण  
मुख समान बनने को वर्नाव्यग्र चरण हो जायेंगे 
देह हवा में टिक  सकेगी, धूल में सब मिल जायेंगे "

"छोटा, अकड़ा और नुकीलाकहता मुझको रहा कुरूप 
मैं केवल एक शूल नहींअनंत मेरेकुछ सुन येरूप ।“ 

“मैं वह अवाम हूँ आमजिसे ख़ास पशू सा गिनते हैं 
जिनके विरोध के स्वरउनको कंटक जैसे चुभते हैं |
मैं वह दलित मनुजकर्म जिसके तू कहता नीच 
शूल सी तुझको लगे चुभनबैठ जब जाता तेरे बीच  
मैं वह नारी रूपभोग का तेरे रहा जो अंश 
मांगे जो वह मान, शूल से तुझको लगते दंश "

प्रदीप
23/07/2013   

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