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Thursday, September 26, 2013

'सास बहू के झगड़े'

माँ ममता की लाली घर आँगन छा जाए
जब प्राची की गोद बाल दिनकर आ जाए ।
कलरव कर कर पंछी अपना सखा बुलाएं
चलो दिवाकर खुले गगन क्रीड़ा हो जाए ॥

सब जग में सुन्दरतम तस्वीर यही मन भाती
गोद हों शिशु अठखेलियाँ मैया हो दुलराती |
लगे ईश सी चमक मुझे उन नयनों से आती
तभी यक़ीनन नित प्रातः प्राची पूजी जाती ||

शीत काल है जब जब कठिन परीक्षा आई
खेल हुआ है कम तब तब रवि करे पढाई ।
और, स्वतंत्र हो खूब सूर्य तब चमक दिखाए
विद्यालय हो बंद, ग्रीष्म जब छुट्टी आये ॥

छोड़ो यह खिलवाड़, है आता यौवन जब रे
पश्चिम की प्रमदा सूर्य पर डारे डोरे ।
चुम्बन से अंग अंग उसका जब भानु सजाए 
लाज लालिमा चुनर ओढ़ पश्चिम शर्माए ॥

प्रणय मिलन में तन जब दोनों का है अकड़े
निज बाहों में खींच प्रभाकर पश्चिम जकड़े ।
अपने कारे केश फेर अंबर पर देती  
करती जग अंधियार डुबो खुद में रवि लेती || 

जब यौवन का ज्वार उतर शीतल हो जाता
रवि को आती याद है उसकी प्राची माता ।
कहता "सुन हे प्रिये, मात के पास रहेंगे
पूर्ण जगत की भांति नमन नित उन्हें करेंगे” ॥

लेकिन, पश्चिम चिढ़ी सासु संग नहीं रहूंगी
सब प्राची को मान, वेदना नहीं सहूँगी ।
पूर्व पड़ोसन दक्षिण उससे सदा जली है
मिले न प्राची पश्चिम, द्वय के बीच खड़ी है ॥

इस पर देखो बही है शीतल सी पुरवाई
बहू को अनुभव कथा, पूर्वा ने कहलाई ।
“तुम पश्चिम हो मुझे तुम्हे कोई पूर्व कहेगा
अचर नहीं कुछ जगत, चक्र में सब बदलेगा” ॥

यौवन का पर जोश वधू में भरा हुआ है
बोली भानुप्रिया, बही तब गर्म हवा है ।
“छोड़ो तुम आध्यात्म, पश्चिमी स्वार्थ सुनो
जब झुकनी है कमर, मान में कुछ तो झुको” ॥

निशिदिन यह आदित्य, चक्र नियमित दुहराता
घर घर में चल रही पुरातन है यह गाथा ।
मिलन को न तैयार हैं प्राची पश्चिम अकड़े
फिर कैसे तब बंद हों सास बहू के झगड़े ॥

 
‘प्रदीप’
२४ सितम्बर २०१३