Followers

Saturday, December 29, 2012

"ये कलम तेरी खुदगर्जी है"

'दामिनी' को समर्पित

"ये कलम तेरी खुदगर्जी है"

जब लिखना था श्रृंगार,
यौवना का तन मन व्यवहार
मधुर मनचाही मनुहार
राह तकती प्रिय की नारि
भीगता तन प्रेम बौछार
मूक नयनों का नेह उदगार ,
तब सखी रूप तू धरती थी
मन की बातें सब सुनती थी
फिर मटक मटक कर चलती थी
और चिढ़ा नारि, जग कहती थी ।।

मनुज दानव ने ले अवतार
किया उस नारी पर है वार
घिरी वह बैरी बीच अंधियार
अस्मिता भूमि रही है हार
निकट पाकर नहि कोई साथ
निरीह नैनों से रही पुकार,
जब कठिन घड़ी ये आन पड़ी
ऐ कलम कहाँ क्यूँ शांत खड़ी
मत बोल ये रब की मर्ज़ी है
ये कलम तेरी खुदगर्जी है ।।

बन स्वामिनि उनको तू ललकार
जिन हाथों में है तेरी धार
कि, नीली स्याही में है ठण्ड
बदल दे इसका रंग तू लाल ,
मनुजता सूर्य गया मुंह मोड़
स्वयं तू पैदा कर अंगार
शेषनागों का पूजन छोड़
उठा खुद पूर्ण मही का भार ।
जब  तू खुद ही नहीं स्वतंत्र
जप रही दासि प्रथा का मन्त्र
बोलती ताक स्वामि मुंह ओर
तो कैसे कटे निशा घनघोर ।।

किस आशा का मन तेरे वास है
तू ही जग की निरी आस है
ऐ कलम तेरी भी नारि राशि है
तू गुलाम तो सब विनाश है ।।

'प्रदीप'
29/12/2012

No comments:

Post a Comment