Followers

Sunday, November 4, 2012

'कांटे की व्यथा' Part 3


मित्रों , खंड काव्य 'कांटे की व्यथा' का तीसरा खंड आपके समक्ष प्रस्तुत है

खंड तीन  - 'शूल प्रतिवाद'

बढ़ा मैं जीवन पथ पर आगे, पुष्प छोड़, यादें लेकर
फिर यादों का हवन किया, हो व्यस्त, भाव आहुति देकर ।
होतीं यादें चतुर, निपुण हैं, अथक युद्ध किया करतीं
दिनभर उनका दमन करो फिर, सपनों में हैं आ जगतीं ।।

पुष्प, प्रेम में समता देखो, दोनों का इक आचार हुआ
बास वहां पर सदा है बसती, वास जहाँ इक बार हुआ ।
फिर मेरा तो पुष्प प्रेम था, मिल दो हुए अती प्रबल
कुटिल कंटक का कुसमय चुभना, मुझको करता अतः विकल ।।

एक रात को स्वप्नलोक में, मिला मुझे फिर से वह शूल
उठी वेदना मन में ऐसी, जैसे बैरी से चखी हो धूल ।
मुस्काता सा लगा मुझे वह, तब क्रोध और बढ़ा मन का
शब्दों के अस्त्र शस्त्र संग, मैं उसके ऊपर जा धमका ।।

“ रे पापी, नीच शूल सुन, तूने कैसा प्रतिशोध लिया ?
मैंने तुझसे फूल छुड़ाया, तूने चुभकर अवरोध किया ?
सुमन सदा से इस जग में, मनुजों के है हेतु हुआ
कंटक ने भी कहीं कभी क्या, फूलों का है भोग किया ?

सरल ह्रदय को चुभते रहना, तेरी प्रवृत्ति सदा रही
तुझ जैसे मनुजों से भी, आच्छादित दिखती मुझे मही ।
सब मर्यादाएं तोड़ के तुम सब, घेर कुसुम को लेते हो
आह निकलती दुखी ह्रदय, कर पान सुखी हो लेते हो ।।

निर्लज्ज कभी सोचा क्या तूने, पग बाधा के हेतु बना ?
जीवन व्यतीत करता है सारा, अकड़ा अकड़ा तना तना ।
पूर्व जन्म के पापों का, परिणाम तुझे ये रूप मिला
फिर खुद से नहीं तू रखता, कोई शिकवा कभी गिला” ।।

पर वह कंटक भाव शून्य सा, ध्यानमग्न हो खड़ा रहा
मेरे शब्द शरों के सम्मुख, योगी योद्धा सा अड़ा रहा ।
पढ़ी हताशा मन की मेरे, सरल भाव से बोला वह
“सुन ले मेरी व्यथा धीर धर, करना फिर तू खुद निर्णय ।।

उस पथ की शोभा हूँ मैं, वीर जिसे अपनाते हैं
देख कर मेरा रूप नुकीला, कायर दिल हिल जाते हैं ।
वीर मनुज खातिर दिव रजनी, फूलों पर देता पहरा
विजय पुष्प वर्ना ले जाता, कोई भी ऐरा गैरा ।।

सार छुपा कर वृहद् ज्ञान का, लघु तन मैं कर लेता हूँ
जटिल प्रश्न इस भांति बना, तब ग्यानी चुनकर देता हूँ ।
साहस, क्षमता और विवेक का, जग परिचय करवाता मैं
रावण सा जब हूँ अकड़ा, तब राम धरा पर लाता मैं ।।

जब मेरा यह रूप अनोखा, मात नियति है रच पायी
तब जाकर ही वसुंधरा, वीरभोग्या कहलायी ।
ग्लानि मुझे किस बात की हो, गर्व भाग्य पर करता शूल
कफ़न सदा ही बनती मेरा, किसी वीर की चरणधूलि ।।

जिस कारण विधि रचे मुझे, मर्यादित करता सदा वही
फूल बहुत से खिले बगल पर, तना रहा मैं हिला नहीं ।
पर स्वार्थ तुझे यदि दिखा कभी, पथभ्रष्ट तुरत तू हो जाता
झुकता सुविधा की खातिर, कष्ट तनिक नहिं सह पाता ।।

तूने सारी बुद्धि लगायी, केवल अपनी सुविधा में
निर्बल भाई लुप्त हो रहे, माँ प्रकृति खड़ी है दुविधा में ।
बिन तेरे तो बाकी के संग, सुखी बहुत सृष्टी रहती
विधि भी शायद सोच रहे, रच मनुज जाति कर दी गलती” ।।

04/11/2012
'प्रदीप'

No comments:

Post a Comment