प्रस्तुत कविता मैंने सन २००१ में वर्षारितु के
दौरान पुणे में लिखी | छोटी छोटी पहाड़ियां हरियाली से पूर्ण
थीं और उस दिन बहुत हलकी हलकी बारिश की फुहारें
हवा में तैर रहें थीं | उस
दिन मुझे पहली बार आभास हुआ की प्रकृति कितनी सुन्दर है | और खेद भी हुआ की मैंने प्रकृति पर कोई
कविता क्यों नहीं लिखी | ये कविता उसी का परिणाम है | मेरे
अनुसार प्रकृति सदैव सुन्दर है इसलिए उसे मैंने सनातन सुंदरी कहा है | और
यह विवेचना भी
करने का प्रयास किया है की वह सनातन सुंदरी क्यों है और इसके कारण उसमे क्या गुण
उत्पन्न होता है |
'सनातन सुंदरी'
कितनी सुन्दर रही सदा तुम
पहचान नहीं पाया अब तक
प्रणय हेतु विधि रचे मुझे
नहि सप्रेम आया तुझ तक |
यौवन देता आनंद तेरा
अति सूक्ष्म, निरंतर और अपार
संवेदनहीन पुरुष मैं देख
प्रकट नहीं करता अभार |
कपट नहीं मुझमे कोई
अज्ञानी हूँ मैं एक प्रिया
निःस्वार्थ प्रेम का तेरे मैं
नहि रखता अपने बोध हिया ||
क्या खूब रचा विधि ने तुझको
हैं साँसे तक शीतल तेरी
हर लेतीं सारी ऊष्मा को
जो रहती साँसों में मेरी |
ओढ़ रखी है हरी चुनर
जो तूने वक्षों पर अपने
काम शाख को हिय में मेरे
तनिक नहीं देती उगने |
जली नहीं हो किसी अगन में
पर प्रदीप्त तुम सदा रही
सतत शान्ति धुन की मल्किन
सुंदरी सनातन तभी बनी ||
सूर्य भाल तेरा मुझमे
करता दिव में ऊर्जा भरण
बिंदिया की फिर तेरे चांदनी
रात्रि में करती कष्टहरण |
और कुरूप देह थक सोती
चिरनिद्रा में मेरी जब
कर आलिंगन, गोद सुलाती
नहि करती तन मेरा अलग |
भरी हो ऐसे चिरंजीव
निष्काम प्रेम से तुम कितना
वृत्ति है ऐसी तेरी क्योंकि
सुंदरी तुम सनातना ||
आज, उठा कर पलकें अपनी
करता तेरा प्रेम वरण
विमुख नहीं मैं, झुका के पलकें
है यह मेरा तुझे नमन ||
पुणे, २००१
'प्रदीप'
bahut sundar !!!!
ReplyDeletedhanyavaad Neeraj ji
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