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Tuesday, August 28, 2012

'भ्रष्टाचार : वृक्ष'


मेरे भगवान् श्रेष्ठ इंसान
तुझको इतना क्या पता?
भ्रष्ट नीयत ने तुम्हारी
हाथों में आरी दी थमा
काटता, मुझमें ईमान देख
वृक्ष हूँ, मूक रहता सर्वदा
पर श्रृष्टि का आधार मैं
जी पायेगा मेरे बिन तू बता ?

विधि का मैं सोलर पैनेल
सीखा बढ़ आतप सहना
बिन भेदभाव फल छाया देना
नियति बंध हो रहना |
पर तूने मुझको काट काट कर
आश्रय हीन किये कितने
लुप्तप्राय हो गए सभी वो
पशु, पक्षी, गरीब थे जितने ||

रोकी कभी तरक्की कोपल की
पायी तो काटी जड़ मेरी
और स्वार्थवश तू करता
चापलूस कंक्रीट भ्रष्ट तरी |
ऊंची चारदीवारी में दुर्गम
ऊंचे कंक्रीट हो जाते हैं
मैं फल से यदि लदा कभी
भुज जनता को झुक जाते हैं ||
 
पर कालचक्र के पहलू कुछ
जो तेरे वश में कभी नहीं
उद्विग्न कभी रवि हो जाता
विचलित हिल जाती कभी मही |
ऐसे में तेरे कंक्रीट
आरोप नहीं खुद ले लेंगे
झुलसायेंगे ये तुझको भी
दाबेंगे अपने मलबे में ||

तेरी संताने तेरे ही
कर्मों का प्रतिफल पाएंगी
मेरे बिन इस कंक्रीट में
जब साँसे दूभर हो जायेंगी |
तब मेरी उत्पत्ति का
तुम अभियान चलाओगे
ईमान जगाओ, वृक्ष लगाओ
अनशन पर अड़ जाओगे ||

28 /08 / 2012
'
प्रदीप'

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