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Thursday, August 2, 2012

'वाणी पुराण'



जो बहुत बोलते हैं, वो दिल खोलते हैं
जो नहीं बोलते हैं, बहुत तोलते हैं ||

कुछ मेरे दुश्मनों का जिक्र करते हैं आधा
वो सदा मेरे मन को यूँ टटोलते हैं ||

मुस्करा कर सदा बात करता है कोई
जो शब्दों अपने शहद घोलते हैं ||

ख़ामोशी भी किस्से सुनाती है तब तब
भाव पीड़ा के जब जब नयन बोलते हैं ||

शब्द मन के ज़हर में भिगोते हैं अक्सर
तीर तान तान तानों के जो छोड़ते हैं ||

अर्थ सागर सा अक्सर समा लेते हैं
ओस की बूँद जैसा जो कम बोलते हैं ||

नर्म मरहम सा खुद वो बन जायेंगे
देख जख्मों को मेरे गरम बोलते हैं ||

मेरी पीड़ा में उनसे तुम भिड़ना नहीं
मित्र हमको ह्रदय से ये जो बोलते हैं ||

धूम्र वाणी में उनके महक जाएगा
जो इर्ष्या में जलते हुए बोलते हैं ||

वो करेले की सब्जी खिलाते हैं आगे
जो लड्डू की थैली लिए घूमते हैं ||

घोल देंगी ये जीवन में संजीवनी
हाँ हम बातें कसैली अभी बोलते हैं ||

02/ 08/ 2102
'
प्रदीप'

2 comments:

  1. sundar rachna pradeep ji bs ye karele wali line poem ke flavour se thodi alag lagi :-)

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    1. Blog par aane ke liye bahut bahut aabhaar Parul ji...karele waali pankti ke baare mein kuchh anya logon ka bhi yahi mat hai

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