Followers

Friday, February 14, 2014

“अनमना अनमना”


अनमना अनमना मन के गीतों का अंत 
मेरे मन से नहीं चल रहा है वसंत |

जब हो खुरदुरी माथ पर की लिखन
राह पथरीली और पग में होती दुखन |
कैसे कर ले तुझे लेखनी तब पसंद ?
शब्द सुन्दर सदा जबकि है तू वसंत ||
अनमना अनमना ......

चाहे अपनों में कितने रहे बेटियाँ 
सिर्फ माँ से ही मन की कहें बेटियाँ |
लिख चुका गीत कितने स्वयं मेरा मन
ढूँढता है मगर आज मानस के छंद ||
अनमना अनमना ......

पंक्तियाँ गीत की अंगुलियां खुद बनें 
खुरदुरे माथों पर धीरे धीरे फिरें |
गीत गीता बनें खत्म कर दें ये द्वंद्व 
किसके मन से चला कब कहाँ है वसंत ||
अनमना अनमना ......

‘प्रदीप’, १२ फरवरी २०१४ 

१ मानस = रामचरितमानस

No comments:

Post a Comment