अनमना अनमना मन के गीतों का अंत
मेरे मन से नहीं चल रहा है वसंत |
जब हो खुरदुरी माथ पर की लिखन
राह पथरीली और पग में होती दुखन |
कैसे कर ले तुझे लेखनी तब पसंद ?
शब्द सुन्दर सदा जबकि है तू वसंत ||
अनमना अनमना ......
चाहे अपनों में कितने रहे बेटियाँ
सिर्फ माँ से ही मन की कहें बेटियाँ |
लिख चुका गीत कितने स्वयं मेरा मन
ढूँढता है मगर आज मानस के छंद ||
अनमना अनमना ......
पंक्तियाँ गीत की अंगुलियां खुद बनें
खुरदुरे माथों पर धीरे धीरे फिरें |
गीत गीता बनें खत्म कर दें ये द्वंद्व
किसके मन से चला कब कहाँ है वसंत ||
अनमना अनमना ......
‘प्रदीप’, १२ फरवरी २०१४
१ मानस = रामचरितमानस
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