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Thursday, September 6, 2012

'छोटू मैगी ऐड'



आजकल टेलीवीजन पर मैगी नूडल्स का एक विज्ञापन चला है | जिसमें श्रद्धेय श्री अमिताभ बच्चन जी एक ग्रामीण परिवेश में कुछ बच्चों को बता रहे है की किस प्रकार लाखन नामक बच्चे के दौड़ में जीतने पर उसकी माँ ने उपहारस्वरूप उसे पांच रुपये की  'छोटू मैगी' खरीद कर खिलाई | यह विज्ञापन पहली बार देखने पर मेरे मन जो भाव उत्पन्न हुए, वो आज इस कविता के रूप में आपके  समक्ष प्रस्तुत हैं | इसके द्वारा किसी का अपमान करने की मेरी नीयत नहीं है | बस मन के भाव हैं |


शहरों में है राज कर चुकी, गावों की बारी आई
अमीताभ जी लेकर आये, छोटू मैगी भाई ||

भूजा चना चबैना खाते, गावों में हैं सारे
सो दुबले पतले रह जाते, बिन मैगी बेचारे |
और गरीब जनता गावों में, भूख क़र्ज़ से मरती
मैगी के सुधा स्वाद से, वंचित अक्सर रहती ||

गरीब वयस्क खुद को रोकेंगे, अतः बिकेगी मैगी कब ?
बच्चों की ललचाई आँखों को, दिखलाया छोटू मैगी तब |
हरिवंशज अमित आभ की, आभा काम में आई
मैगी को छूकर गरीब की, बटुली धन्य कहाई ||

तब मेरा मस्तिष्क यह बोला, उद्योगों ने है चाल चली
नवभारत को डसने देखो, मैगी है सर्पिनी बनी |
ज्यादा आबादी गावों में, पर गरीब हैं वहां सभी
पांच रुपये ही नोंचो सबसे, मैगी छोटू बनी तभी ||

पर बोल उठा मेरा दिल यह, ग्रामीणों सा भोला भाला
"
रे दिमाग ! तू स्वार्थजनक, होकर आया क्या मधुशाला ?
अमिताभ जी नहीं रे ऐसे, हर प्रकार संपन्न सुखी
छलेंगे काहें वो गरीब को, जो पहले से स्वतः दुखी ?

देख दशा दयनीय गाँव की, पिछड़ा ना रह जाए
राष्ट्रप्रेम भावों से भर, वो आगे बढ़कर आये |
वो महान, जनता के प्यारे, धोखा नहीं दिया होगा
निश्चित इस विज्ञापन का, कुछ दाम नहीं लिया होगा" ||

गद्य में भी कह सकता था, पर पद्य यहाँ चुना मैंने
स्वार्थहीन कविता रग बहती, उनमें, कहीं सुना मैंने ||

०६ सितम्बर २०१२
'
प्रदीप'

Friday, August 31, 2012

'भ्रष्टाचार - कामदेव'

भ्रष्टाचार असुर से, हे कामदेव !
तुलना में सम हो जाते हो
फिर बतलाओ क्यूँकर तुम
देवों में पाए जाते हो ?
साधू योगी का कोई जब
ईमान हिलाना होता है
तुम दोनों का अक्सर तब
उपयोग में आना होता है ||

कनक सुंदरी का चितवन
रिश्वत में आगे करते हो
ध्यान दिया तुम पर क्षण भर
आगोश में अपने भरते हो |
तुम दोनों ही मुझको तो
बाली जैसे लगते हो
सम्मुख होता, तुम मेरा तब
बल आधा हर लेते हो ||

पर तुमको तो रूद्र ने अपनी
भस्म किया आँखों से था
और बालि को रामचंद्र ने
वध डाला त्रेता में था |
पर शायद तब शिव क्रोधित थे
और राम थे आड़ लिए
क्षीण हुआ प्रभाव वार का
नष्ट नहीं तुम पूर्ण हुए ||

वह अवशेषित अंश तुम्हारा
अन्दर मेरे बैठा है
पुनर्जन्म ले तुम आये
अब साथ तुम्हारा देता है |
इसी प्रकार भ्रष्ट असुर
जब सम्मुख मेरे होता है
मेरे अन्दर बैठा कोई
संग उसके हो लेता है ||

तेरे वश से, जो नहिं मेरा
इच्छा उसकी रखता हूँ
असंतुलित होगा समाज
इस मर्यादा से नहिं डरता हूँ |
तुम दोनों के बंधन से मैं
बाहर जब आ जाता हूँ
आत्मग्लानि के बोध से मैं
हिय भीतर तक भर जाता हूँ ||

उभय शत्रु  से भिड़ने का अब
उपाय नवीन करना होगा
तुझसे, रक्षा कवच मंत्र यह
इसमें प्रवीण बनना होगा |
"
धर संतोषी रूप, पार्वती
देवी आ समा मुझमें,
अन्दर बैठा लोभी कामी
असुर हनन क्षमता तुझमें "

तब नहिं होगा मुझमें कोई
जो तेरा साथ निभाएगा
तेरा संग, मेरी इच्छा से
सृजन हेतु रह जाएगा |
और कभी जब भ्रष्टासुर
आएगा सम्मुख मेरे
होंगे प्रयुक्त तब शिव त्रिनेत्र
या शर मर्यादा पुरषोत्तम के ||

देखो ना, मेरी युक्ति यह
उत्तर कोई समझाती है
असुर देव में अंतर क्या ?
शायद यह भाव बताती है |
तुम सृष्टी का आधार अंग
सृजन तुम्ही से होता है
हानि नहीं, यदि संयम संग हो
लाभ सभी को होता है ||

पर भ्रष्टासुर में गुण ऐसा
कोई नहीं दिखा अब तक
सदा हानि प्रद वह रहता
नष्ट न हो पूरा जब तक |
शायद इससे प्रभु ने तुमको
देवों में रख छोड़ा है
मैं शंकित था अब तक क्यूँकर
विधि ने नीयम तोडा है ||

३१ / ०८ / २०१२
प्रदीप