एक
दिवस को मेरी सोच में
विस्मित सी कविता आई
प्रश्न भावना निहित थी जिसमें
मन ऐसा संग अपने लायी
बोली मुझसे "प्रिय तुम बोलो
क्यूँ मैं कविता ही कहलाई ?
आदि कवी सब पुरुष थे इससे
क्या नारी से समता पायी ?
उसको अपने निकट बिठाया
फिर अपना मत उसे बताया
नहिं ज्ञानी मैं, सुन पर इतना
समझ सका मैं अब तक जितना
विस्मित सी कविता आई
प्रश्न भावना निहित थी जिसमें
मन ऐसा संग अपने लायी
बोली मुझसे "प्रिय तुम बोलो
क्यूँ मैं कविता ही कहलाई ?
आदि कवी सब पुरुष थे इससे
क्या नारी से समता पायी ?
उसको अपने निकट बिठाया
फिर अपना मत उसे बताया
नहिं ज्ञानी मैं, सुन पर इतना
समझ सका मैं अब तक जितना
तुम, नारी,
द्रव इक समान हो
मुरझाये में भरती प्राण हो
कवि, घर, बर्तन मिलता जैसा
कर लेती स्वरुप तुम वैसा
पुरुष कठोर, नारि कोमलता
नर हिमखंड, नारि है सरिता
लचना, घुलना, ढलना, बंधना
तुझमें द्रव-नारी सी क्षमता
मुरझाये में भरती प्राण हो
कवि, घर, बर्तन मिलता जैसा
कर लेती स्वरुप तुम वैसा
पुरुष कठोर, नारि कोमलता
नर हिमखंड, नारि है सरिता
लचना, घुलना, ढलना, बंधना
तुझमें द्रव-नारी सी क्षमता
शान्ति, क्रान्ति,
रति, भक्ति, करुण
औ
तू जननी वत्सल की सुन
पुरुष सी तुम हो, क्या ये संभव?
गर्भ ग्रहण से नर निर्गुण ||
22 /08 /2012, 'प्रदीप'
तू जननी वत्सल की सुन
पुरुष सी तुम हो, क्या ये संभव?
गर्भ ग्रहण से नर निर्गुण ||
22 /08 /2012, 'प्रदीप'