Followers

Wednesday, August 22, 2012

'कविता स्त्री क्यों'


एक दिवस को मेरी सोच में
विस्मित सी कविता आई
प्रश्न भावना निहित थी जिसमें
मन ऐसा संग अपने लायी

बोली मुझसे "प्रिय तुम बोलो
क्यूँ मैं कविता ही कहलाई ?
आदि कवी सब पुरुष थे इससे
क्या नारी से समता पायी ?

उसको अपने निकट बिठाया
फिर अपना मत उसे बताया
नहिं ज्ञानी मैं, सुन पर इतना
समझ सका मैं अब तक जितना

तुम, नारी, द्रव इक समान हो
मुरझाये में भरती प्राण हो
कवि, घर, बर्तन मिलता जैसा
कर लेती स्वरुप तुम वैसा

पुरुष कठोर, नारि कोमलता
नर हिमखंड, नारि है सरिता
लचना, घुलना, ढलना, बंधना
तुझमें द्रव-नारी सी क्षमता

शान्ति, क्रान्ति, रति, भक्ति, करुण औ
तू जननी वत्सल की सुन
पुरुष सी तुम हो, क्या ये संभव?
गर्भ ग्रहण से नर निर्गुण ||

22 /08 /2012, 'प्रदीप'



Wednesday, August 15, 2012

'सनातन सुंदरी'


प्रस्तुत कविता मैंने सन २००१ में वर्षारितु के दौरान पुणे में लिखी | छोटी छोटी पहाड़ियां हरियाली से पूर्ण थीं और उस दिन बहुत हलकी हलकी बारिश की फुहारें हवा में तैर रहें थीं | उस दिन मुझे पहली बार आभास हुआ की प्रकृति कितनी सुन्दर है | और खेद भी हुआ की मैंने प्रकृति पर कोई कविता क्यों नहीं लिखी | ये कविता उसी का परिणाम है | मेरे अनुसार प्रकृति सदैव सुन्दर है इसलिए उसे मैंने सनातन सुंदरी कहा है और यह विवेचना  भी करने का प्रयास किया है की वह सनातन सुंदरी क्यों है और इसके कारण उसमे क्या गुण उत्पन्न होता है |
 
'सनातन सुंदरी'

कितनी सुन्दर रही सदा तुम
पहचान नहीं पाया अब तक
प्रणय हेतु विधि रचे मुझे
नहि सप्रेम आया तुझ तक |
यौवन देता आनंद तेरा
अति सूक्ष्म, निरंतर और  अपार
संवेदनहीन पुरुष मैं देख
प्रकट नहीं करता अभार |
कपट नहीं मुझमे कोई
अज्ञानी हूँ मैं एक प्रिया
निःस्वार्थ प्रेम का तेरे मैं
नहि रखता अपने बोध हिया ||

क्या खूब रचा विधि ने तुझको
हैं साँसे तक शीतल तेरी
हर लेतीं सारी ऊष्मा को
जो रहती साँसों में मेरी |
ओढ़ रखी है हरी चुनर
जो तूने वक्षों पर अपने
काम शाख को हिय में मेरे
तनिक नहीं देती उगने |
जली नहीं हो किसी अगन में
पर प्रदीप्त तुम सदा रही
सतत शान्ति धुन की मल्किन
सुंदरी सनातन तभी बनी ||

सूर्य भाल तेरा मुझमे
करता दिव में ऊर्जा भरण
बिंदिया की फिर तेरे चांदनी
रात्रि में करती कष्टहरण |
और कुरूप देह थक सोती
चिरनिद्रा में मेरी जब
कर आलिंगन, गोद सुलाती
नहि करती तन मेरा अलग |
भरी हो ऐसे चिरंजीव
निष्काम प्रेम से तुम कितना
वृत्ति है ऐसी तेरी क्योंकि
सुंदरी तुम सनातना ||

आज, उठा कर पलकें अपनी
करता तेरा प्रेम वरण
विमुख नहीं मैं, झुका के पलकें
है यह मेरा तुझे नमन ||

पुणे, २००१
'
प्रदीप'

Wednesday, August 8, 2012

'जीवनसंगिनी'


तेरे शीश अरण्य पर खींचू
लखन रेख सिन्दूरी जब
सिया बिताये जीवन यात्रा
टहल कुटी में पूरी तब |
कहने को तो तुम मेरी
जीवनसंगिन कहलाती हो
रस्म, लाज, संतोष भाव से
अनुगामी बन जाती हो ||

धरती से नभ तक काया के
चिन्ह टंगे बंधन के हैं
बिछिया, चूड़ी, बिंदिया, सेन्हुर
सौगंध समर्पण के ये हैं |
स्त्री मन का भाव तो देखो
इन बेड़ी पर इतराती हो
अहम् जला कर, स्वर्णकार बन
आभूषण इन्हें बताती हो ||

जिस दिन से तुम हौले से
जीवन में आ जाती हो
बिना पुष्प  इत्र आदि के
घर आँगन महकाती हो |
आधे आधे दो चंदा मिल
मैं पूर्ण चन्द्र हो जाता हूँ
अस्तित्व स्वयं का बना अमावस
पूनम मुझे बनाती हो ||

नेह रंग से जीवन चुनरी
सतरंगी रंग देती हो
आड़ बना कर मुझे चुनर की
बाहों में भर लेती हो |
आलिंगन तेरा पाकर मैं
हूँ चित्रकार कोई बनता
तेरी काया के गुलाल से
कुछ पुष्प चुनर पर हूँ रंगता ||

मेरे घर की बगिया की
तुम मालिनि बन जाती हो
कुछ पौधों को जीवन देकर
सारे तरु अपनाती हो |
पोषण, सेवा में तुम सबकी
लुप्तप्राय हो जाती हो
पुष्प सुनहरे सोहें माला
धागा बन खो जाती हो ||

इस जीवन की कविता में
जब कठिन अंतरे आते हैं
मेरी क्षमता, मेरा पौरुष
संयम मेरा अजमाते हैं
और शब्द समय के हाव भाव से
मैं विचलित हो जाता हूँ,
तब शब्दों को तौल तौल कर
धैर्य अर्थ बतलाती हो
सहयोगी बन कर मेरी तुम
स्थायी मुझे बनाती हो ||

तुमने मानी सब रस्में हैं
तुमको न होने की कसमें हैं
विवाह एक बंधन कहलाता
विशेष वहन है अर्थ बताता,
सत्य यहीं, पर एक और है
सदा रहा है, कोई दौर है
जब रूह मिलन हो जाता है
यही बंधन बंध न हो जाता है ||

09 /08 /2012
'
प्रदीप'