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Friday, October 5, 2012

कांटे की व्यथा - Part1



मित्रों, एक खंड काव्य लिखने की सोची है | इसके दो खंड लिखा चूका हूँ दो खण्डों के बाद की बात कब लिख पाऊंगा नहीं जानता | उत्साह बनाये रखने के लिए आपके स्नेह और आशीर्वाद की आव्यश्यकता है | फिलहाल, पहला खंड आज आपके समक्ष है | पढ़कर बताइयेगा कैसा लिख पाया |

'कांटे की व्यथा'
खंड एक --'प्रकृति नमन'

महाप्रभू की प्रिया तुम्ही,  हे जगत मात मैं तेरी शरण
प्रकृति रूप जब धरा है तुमने, हम सबका तब हुआ जनन |
बच्चों की गलती तुम सहती, मूक रही, क्षति लेकर तन
मात प्रकृति तेरे स्वरुप को, सादर मेरा कोटि नमन ||

देखो मेरा स्वार्थ निजी, कुछ पाने की इच्छा लाया
भूख लगी जब ह्रदय उदर, तब बालक माता तक आया |
काव्य कामना लिए हूँ मन, मैं बालक तेरा अज्ञानी
कविकुल पाने को प्रयासरत, मैं भावहीन, क्षीण वाणी ||

पर जन्म से कोई बालक तो, होता नहीं कभी ज्ञाता
जग में जीने के गुण सारे, सिखलाती उसको माता |
अतः मुझे भी सुन तू मैया, काव्य की भाषा सिखला दे
शब्द, भाव सब तुझसे उपजे, पयपान इन्हीं से करवा दे ||

तरु छाया के नीचे बैठा, मान इसे मैं गोद तेरी
यहीं से लिखना शुरू करे, छू तेरे चरण ये कलम मेरी |
तुम सहाय होना तब मैया, बिगड़ जाए कोई भाव अगर
ज्यों हाथ पकड़ लिखवाती माँ, बालक से पहला अक्षर ||

भाव शब्द ऐसे जब आयें, बोध कठिन होगा जिनका
और उपाय नवीन करना हो, अर्थ बताने को उनका |
तब करना नाटक जीवन कुछ, प्रभु संग स्वांग रचा ऐसे
सीख हेतु, कथा समझाती, अभिनय करके माँ जैसे ||

मन तो बालक का है चंचल, पढने लिखने में रुची कहाँ?
और कई हैं खेल जगत में, भटक जायेगा यहाँ वहां |
मुझे बुलाने तरू तले, तब सूर्य से कहना तेज जले
करने घर भीतर बालक, माँ झूठे क्रोधित नयन करे ||

होगी जब कटु अलोचना, काव्य की मेरे, माँ सुनना
बालक हूँ मैं, टूट कहूँगा, नहीं मुझे अब कुछ पढ़ना |
तब ऐसी प्रिय छटा बिखेरना, कवि मन को सहलाती जो
जैसे माता पढने खातिर, बालक को दुलराती हो ||

इस प्रकार अंबे तुम मेरी, देखभाल करती रहना
हर धड़कन ही माँ पहचाने, अधिक मुझे अब क्या कहना |
कहने चला एक संग मेरे, घटी कभी जो लघू कथा
बुनी है इसमें, सुनी जो मैंने, स्वयं शूल की कही व्यथा ||

'प्रदीप'
04/10/2012

Thursday, September 6, 2012

'छोटू मैगी ऐड'



आजकल टेलीवीजन पर मैगी नूडल्स का एक विज्ञापन चला है | जिसमें श्रद्धेय श्री अमिताभ बच्चन जी एक ग्रामीण परिवेश में कुछ बच्चों को बता रहे है की किस प्रकार लाखन नामक बच्चे के दौड़ में जीतने पर उसकी माँ ने उपहारस्वरूप उसे पांच रुपये की  'छोटू मैगी' खरीद कर खिलाई | यह विज्ञापन पहली बार देखने पर मेरे मन जो भाव उत्पन्न हुए, वो आज इस कविता के रूप में आपके  समक्ष प्रस्तुत हैं | इसके द्वारा किसी का अपमान करने की मेरी नीयत नहीं है | बस मन के भाव हैं |


शहरों में है राज कर चुकी, गावों की बारी आई
अमीताभ जी लेकर आये, छोटू मैगी भाई ||

भूजा चना चबैना खाते, गावों में हैं सारे
सो दुबले पतले रह जाते, बिन मैगी बेचारे |
और गरीब जनता गावों में, भूख क़र्ज़ से मरती
मैगी के सुधा स्वाद से, वंचित अक्सर रहती ||

गरीब वयस्क खुद को रोकेंगे, अतः बिकेगी मैगी कब ?
बच्चों की ललचाई आँखों को, दिखलाया छोटू मैगी तब |
हरिवंशज अमित आभ की, आभा काम में आई
मैगी को छूकर गरीब की, बटुली धन्य कहाई ||

तब मेरा मस्तिष्क यह बोला, उद्योगों ने है चाल चली
नवभारत को डसने देखो, मैगी है सर्पिनी बनी |
ज्यादा आबादी गावों में, पर गरीब हैं वहां सभी
पांच रुपये ही नोंचो सबसे, मैगी छोटू बनी तभी ||

पर बोल उठा मेरा दिल यह, ग्रामीणों सा भोला भाला
"
रे दिमाग ! तू स्वार्थजनक, होकर आया क्या मधुशाला ?
अमिताभ जी नहीं रे ऐसे, हर प्रकार संपन्न सुखी
छलेंगे काहें वो गरीब को, जो पहले से स्वतः दुखी ?

देख दशा दयनीय गाँव की, पिछड़ा ना रह जाए
राष्ट्रप्रेम भावों से भर, वो आगे बढ़कर आये |
वो महान, जनता के प्यारे, धोखा नहीं दिया होगा
निश्चित इस विज्ञापन का, कुछ दाम नहीं लिया होगा" ||

गद्य में भी कह सकता था, पर पद्य यहाँ चुना मैंने
स्वार्थहीन कविता रग बहती, उनमें, कहीं सुना मैंने ||

०६ सितम्बर २०१२
'
प्रदीप'