तेरे शीश अरण्य पर खींचू
लखन रेख सिन्दूरी जब
सिया बिताये जीवन यात्रा
टहल कुटी में पूरी तब |
कहने को तो तुम मेरी
जीवनसंगिन कहलाती हो
रस्म, लाज, संतोष भाव से
अनुगामी बन जाती हो ||
धरती से नभ तक काया के
चिन्ह टंगे बंधन के हैं
बिछिया, चूड़ी, बिंदिया, सेन्हुर
सौगंध समर्पण के ये हैं |
स्त्री मन का भाव तो देखो
इन बेड़ी पर इतराती हो
अहम् जला कर, स्वर्णकार बन
आभूषण इन्हें बताती हो ||
जिस दिन से तुम हौले से
जीवन में आ जाती हो
बिना पुष्प इत्र आदि के
घर आँगन महकाती हो |
आधे आधे दो चंदा मिल
मैं पूर्ण चन्द्र हो जाता हूँ
अस्तित्व स्वयं का बना अमावस
पूनम मुझे बनाती हो ||
नेह रंग से जीवन चुनरी
सतरंगी रंग देती हो
आड़ बना कर मुझे चुनर की
बाहों में भर लेती हो |
आलिंगन तेरा पाकर मैं
हूँ चित्रकार कोई बनता
तेरी काया के गुलाल से
कुछ पुष्प चुनर पर हूँ रंगता ||
मेरे घर की बगिया की
तुम मालिनि बन जाती हो
कुछ पौधों को जीवन देकर
सारे तरु अपनाती हो |
पोषण, सेवा में तुम सबकी
लुप्तप्राय हो जाती हो
पुष्प सुनहरे सोहें माला
धागा बन खो जाती हो ||
इस जीवन की कविता में
जब कठिन अंतरे आते हैं
मेरी क्षमता, मेरा पौरुष
संयम मेरा अजमाते हैं
और शब्द समय के हाव भाव से
मैं विचलित हो जाता हूँ,
तब शब्दों को तौल तौल कर
धैर्य अर्थ बतलाती हो
सहयोगी बन कर मेरी तुम
स्थायी मुझे बनाती हो ||
तुमने मानी सब रस्में हैं
तुमको न होने की कसमें हैं
विवाह एक बंधन कहलाता
विशेष वहन है अर्थ बताता,
सत्य यहीं, पर एक और है
सदा रहा है, कोई दौर है
जब रूह मिलन हो जाता है
यही बंधन बंध न हो जाता है ||
09 /08 /2012
'प्रदीप'
वाह...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रदीप जी...
संग्रहणीय रचना.
अनु
Anu ji,
Deleteblog dekhne ke liye aur protsaahan ke liye bahut bahut aabhaar